आत्म-संरक्षण प्रभुरूप कवच व भरा हुआ शरीर
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र में बाह्य कृमियों से होनेवाले विकारों की चिकित्सा का निर्देश था। प्रस्तुत मन्त्र अध्यात्म रोगों को चिकित्सा का उल्लेख करता है। इसके लिये कहते हैं कि (गोभिः) = वेद-वाणियों के द्वारा ज्ञान की वाणियों को सदा अपनाने के द्वारा (अग्नेः वर्म) = उस प्रभु के कवच को (परिव्ययस्व) = चारों ओर से ओढ़नेवाला बन । अपने को प्रभुरूप कवच से आच्छादित करले । [२] इसके अतिरिक्त तेरा शरीर भी अस्थिपंजर - सा ही न हो। तू अपने शरीर को भी (पीवसा) = मज्जा के द्वारा (मेदसा च) = और मेदस् के द्वारा (सं प्रोर्णुस्व) = आच्छादित कर । तेरा शरीर, मज्जा व मेदस् से भरा-सा प्रतीत हो, क्षीण न हो। पतला-दुबला आदमी कुछ चिड़चिड़े स्वभाव का हो जाता है । शरीर भरा हुआ हो और मनुष्य प्रभु स्मरण में चलता हो तो वासनाओं का आक्रमण नहीं होता । पतला-दुबला व्यक्ति भी वासनाओं का शिकार हो जाता है। प्रभु से दूर होने पर तो वासनाएँ हमारे पर आधिपत्य जमा ही लेती हैं। [३] तू प्रभु को कवच बना, तथा शरीर भी तेरा भरा हुआ हो । जिससे (त्वा) = तुझे यह काम (न इत् पर्यङ्ख्याते) = चारों ओर से चिपट नहीं जाता, तुझे यह अपने वशीभूत नहीं कर लेता। वह 'काम' जो कि (धृष्णुः) = धर्षण करनेवाला है, हमें कुचल डालनेवाला है । (हरसा जर्हृषाण:) = विषयों में हरण के द्वारा रोमाञ्चित करनेवाला है । (दधृक्) = पकड़ लेनेवाला है, अर्थात् इस काम के वशीभूत हो जाने पर इस से पीछा छूटना बड़ा कठिन है। (विधक्ष्यन्) = और अपने काबू करके यह काम हमें भस्म कर देनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस काम के आक्रमण से हम बच तभी सकते हैं यदि स्मरण रूप कवच प्रभु हमने धारण किया हुआ हो और हमारा शरीर अस्थिपंजर-सा न होकर भरा हुआ व सुदृढ़ हो ।