पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (जातवेदः) = विकसित ज्ञान वाले आचार्य ! आप (यदा) = जब इस विद्यार्थी को (शृतं करसि) = ज्ञान परिपक्व कर देते हैं, (अथ) = तो (ईम्) = अब (एनम्) = इसको (पितृभ्यः) = अपने माता-पिता के लिये (परिदत्तात्) = वापिस देते हैं । जब तक यह विद्यार्थी ज्ञान परिपक्व नहीं होता तब तक आचार्यकुल में ही निवास करता है। ज्ञान को प्राप्त करके घर में लौटता है। [२] आचार्यकुल में रहता हुआ (यदा) = जब (एतां असुनीतिम्) = इस प्राणविद्या को, जीवन-नीति को (गच्छाति) = अच्छी प्रकार प्राप्त कर लेता है, (अथा) = तब यह ज्ञान को प्राप्त पुरुष (देवानाम्) = सब देवों का, इन्द्रियों को (वशनी:) = वश में प्राप्त करानेवाला (भवाति) = होता है । 'असुनीति' का अध्ययन करके यह सूर्यादि देवों का इस प्रकार उचित सम्पर्क बनाता है कि ये सब देव उसके अनुकूल ही अनुकूल होते हैं, मानो ये सब देव उसके वश में हों। इन देवों के साथ इसका किसी प्रकार का संघर्ष नहीं होता । ये देव ही शरीर में चक्षुसादि के रूप से रह रहे हैं। इन शरीरस्थ देवांशों का बाह्य देवों से किसी प्रकार के युद्ध का न होना ही 'स्वास्थ्य' कहलाता है। इसी का वर्णन अगले मन्त्र में कुछ विस्तार से दिया है-
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आचार्यकुल में असुनीति का अध्ययन करके हम सूर्यादि देवों को वश में प्राप्त करानेवाले हों। इनसे हमारी प्रतिकूलता न हो और हम पूर्ण स्वस्थ हों ।