उशन्= प्रभु प्राप्ति ही कामना वाला
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे हव्याद अग्ने ! (उशन्तः) = उस प्रभु प्राप्ति की कामना करते हुए हम (त्वा) = तुझे (निधीमहि) = अपने में स्थापित करते हैं वस्तुतः यदि हम हव्य पदार्थों का सेवन करेंगे तभी शुद्ध अन्त:करण वाले बनकर प्रभु के दर्शन को भी कर सकेंगे। [२] (उशन्तः) = उस प्रभु की कामना करते हुए हम (समिधीमहि) = तुझ हव्याद अग्नि को समिद्ध करते हैं । जाठराग्नि मन्द हो जाने पर भी सब शक्तियों का ह्रास हो जाता है और प्रभु दर्शन का प्रसंग नहीं रहता । निर्बल के लिये प्रभु दर्शन का सम्भव नहीं । सो यह स्पष्ट है कि हमें इस अन्तः स्थित वैश्वानर अग्नि में हव्य पदार्थों को ही डालना है, और उन्हें भी इस प्रकार मात्रा में ही प्रयुक्त करना है कि यह अग्नि बुझ ही न जाए। 'मात्रा बलम्' में तैत्तिरीय उपनिषद् के शब्द मात्रा के महत्त्व को उत्तमता से व्यक्त कर रहे हैं। [३] हे (उशन्) = हमारे हित की कामना करनेवाले अग्ने ! (उशतः) = प्रभु प्राप्ति की कामना वाले (पितॄन्) = पितरों को (हविषे अत्तवे) = हव्य पदार्थों को खाने के लिये (आवह) = समन्तात् प्राप्त करा । ये पितर सदा हव्य पदार्थों को ही स्वीकार करें। इन के ग्रहण से इन में दिव्यता का वर्धन होगा । इस दिव्यता के वर्धन से ये 'महादेव' को प्राप्त करने के योग्य बनेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपनी वैश्वानर अग्नि में हव्य पदार्थों को ही मात्रा में डालें। इस प्रकार समिद्ध होकर यह अग्नि हमें सशक्त बनायेगी और हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले होंगे।