देवत्व व पितृत्व तथा शाकाहार
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो यह (क्रव्यवाहनः) = मांस का वहन करनेवाला (अग्निः) = क्रव्याद अग्नि अर्थात् मांस भोजन (ऋतावृधः) = ऋत का वर्धन करनेवाले, यज्ञ [= ऋत] को अपने जीवन में बढ़ानेवाले (पितॄन्) = पितरों के साथ भी (यक्षत्) = संगत हो जाता है अर्थात् यज्ञशील पितरों में भी कभी-कभी मांस भोजन की ओर झुकाव हो जाता है । सो वे प्रभु (देवेभ्यः) = देवताओं के लिये (च) = और (पितृभ्यः) = पितरों के लिये भी (इद् उ) = निश्चय से (हव्यानि) = हव्य पदार्थों का (प्रवोचति) = प्रकृष्ट उपदेश देते हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार से, भिन्न-भिन्न शब्दों में प्रभु मांस भोजन की हीनता व त्याज्यता का प्रतिपादन करते हैं और शाक भोजन की उपादेयता को कहते हैं । अथर्व के ये शब्द प्रसिद्ध हैं कि 'व्रीहिमत्तं यवमत्तं माष भक्षो तिलम्' जौ, चावल, उड़द व तिल आदि पदार्थों को ही तुमने भोजन के रूप में लेना है । [२] बारम्बार उपदेश की आवश्यकता को ही यहाँ यह कहकर व्यक्त किया गया है कि यह मांस भोजन बड़ों-बड़ों को भी लुब्ध कर लेता है। सो इससे बचने के लिये आवश्यक है कि हमें स्थान-स्थान पर प्रभु की ओर से हव्य पदार्थों के प्रयोग का उपदेश हो । यह उपदेश विशेषकर देववृत्ति व पितृवृत्ति वालों के लिये आवश्यक है, क्योंकि उनका अनुकरण ही सामान्य लोगों ने करना होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देव व पितर सदा हव्य पदार्थों को ही ग्रहण करनेवाले हों । वस्तुतः यह हव्य पदार्थों का स्वीकार ही उनके देवत्व व पितृत्व को कायम रखता है। मांस भोजन से वे देव व पितर नहीं रह जाते ।