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यो अ॒ग्निः क्र॑व्य॒वाह॑नः पि॒तॄन्यक्ष॑दृता॒वृध॑: । प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo agniḥ kravyavāhanaḥ pitṝn yakṣad ṛtāvṛdhaḥ | pred u havyāni vocati devebhyaś ca pitṛbhya ā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । अ॒ग्निः । क्र॒व्य॒ऽवाह॑नः । पि॒तॄन् । यक्ष॑त् । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । प्र । इत् । ऊँ॒ इति॑ । ह॒व्यानि॑ । वो॒च॒ति॒ । दे॒वेभ्यः॑ । च॒ । पि॒तृऽभ्यः॑ । आ ॥ १०.१६.११

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:16» मन्त्र:11 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:22» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:11


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः क्रव्यवाहनः-अग्निः ऋतावृधः पितॄन्-यक्षत्-इत्-उ-देवेभ्यः-च पितृभ्यः-आ हव्यानि प्रवोचति) जो शवमांस की वोढा अग्नि यज्ञवर्धक सूर्यरश्मियों से सङ्गत होती है, वही अग्नि इस समय आहुतियुक्त चमस से देवों दिव्यगुणयुक्त पदार्थों और पूर्वोक्त सूर्यरश्मियों के लिये भी हव्यों का उच्चारण अर्थात् शवमांस के चटपटा शब्द के स्थान में घृतादि हव्य की सरसर ध्वनि करती है ॥११॥
भावार्थभाषाः - शवाग्नि में घृतादि हव्य डालने से शवमांस के चटपटा शब्द को भी दबाकर हव्य की सरसर ध्वनि के साथ उक्त अग्नि देवयज्ञ और पितृयज्ञ के रूप को धारण कर लेती है ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवत्व व पितृत्व तथा शाकाहार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो यह (क्रव्यवाहनः) = मांस का वहन करनेवाला (अग्निः) = क्रव्याद अग्नि अर्थात् मांस भोजन (ऋतावृधः) = ऋत का वर्धन करनेवाले, यज्ञ [= ऋत] को अपने जीवन में बढ़ानेवाले (पितॄन्) = पितरों के साथ भी (यक्षत्) = संगत हो जाता है अर्थात् यज्ञशील पितरों में भी कभी-कभी मांस भोजन की ओर झुकाव हो जाता है । सो वे प्रभु (देवेभ्यः) = देवताओं के लिये (च) = और (पितृभ्यः) = पितरों के लिये भी (इद् उ) = निश्चय से (हव्यानि) = हव्य पदार्थों का (प्रवोचति) = प्रकृष्ट उपदेश देते हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार से, भिन्न-भिन्न शब्दों में प्रभु मांस भोजन की हीनता व त्याज्यता का प्रतिपादन करते हैं और शाक भोजन की उपादेयता को कहते हैं । अथर्व के ये शब्द प्रसिद्ध हैं कि 'व्रीहिमत्तं यवमत्तं माष भक्षो तिलम्' जौ, चावल, उड़द व तिल आदि पदार्थों को ही तुमने भोजन के रूप में लेना है । [२] बारम्बार उपदेश की आवश्यकता को ही यहाँ यह कहकर व्यक्त किया गया है कि यह मांस भोजन बड़ों-बड़ों को भी लुब्ध कर लेता है। सो इससे बचने के लिये आवश्यक है कि हमें स्थान-स्थान पर प्रभु की ओर से हव्य पदार्थों के प्रयोग का उपदेश हो । यह उपदेश विशेषकर देववृत्ति व पितृवृत्ति वालों के लिये आवश्यक है, क्योंकि उनका अनुकरण ही सामान्य लोगों ने करना होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देव व पितर सदा हव्य पदार्थों को ही ग्रहण करनेवाले हों । वस्तुतः यह हव्य पदार्थों का स्वीकार ही उनके देवत्व व पितृत्व को कायम रखता है। मांस भोजन से वे देव व पितर नहीं रह जाते ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः क्रव्यवाहनः अग्निः ऋतावृधः पितॄन्-यक्षत्-इत्-उ-देवेभ्यः-च पितृभ्यः-आ हव्यानि प्रवोचति) यः शवमांसस्य वोढाऽग्निः “क्रव्ये च” [अष्टा०३।२।६९] इति योगविभागात् क्रव्योपपदे वहधातोर्ञ्युट्। ऋतावृधः-ऋतस्य यज्ञस्य वर्धयितॄन् “ऋतावृधो यज्ञवृधः” [निरु०१२।१३] पितॄन्-सूर्यरश्मीन् जयेत्-सङ्गतो भवेत्, “सङ्गतिकरणमत्र यज्ञार्थः”। स एवाग्निरिदु-इदानीं तु-आहुतियुक्तचमसेन देवेभ्यः-दिव्यगुणेभ्यश्च पितृभ्यश्च पूर्वोक्तेभ्यः, ‘आकारः समुच्चयार्थः’। “एतस्मिन्नेवार्थे (समुच्चयार्थे) देवेभ्यश्च पितृभ्य एत्याकारः” [निरु०१।४] हव्यानि प्रवोचति प्रवदति, ‘लडर्थे लेट्’। शवमांसचटचटास्थानेऽधुना हव्य-सरसरशब्दं करोति-इत्यर्थः ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The fire, participant of natural law, which carries the elements of the corpse to nature, pervades in senior humanity and vibrates in natural energies too. The same fire carries the yajnic homage and proclaims the gifts for the ancestors, for the divines and for nature.