वांछित मन्त्र चुनें

परी॒मे गाम॑नेषत॒ पर्य॒ग्निम॑हृषत । दे॒वेष्व॑क्रत॒ श्रव॒: क इ॒माँ आ द॑धर्षति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

parīme gām aneṣata pary agnim ahṛṣata | deveṣv akrata śravaḥ ka imām̐ ā dadharṣati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । इ॒मे । गाम् । अ॒ने॒ष॒त॒ । परि॑ । अ॒ग्निम् । अ॒हृ॒ष॒त॒ । दे॒वेषु । अ॒क्र॒त॒ । श्रवः॑ । कः । इ॒मान् । आ । द॒ध॒र्ष॒ति॒ ॥ १०.१५५.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:155» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:5


472 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इमे) ये कृषक-किसान (गाम्) बैलों को (परि-अनेषत) खेतों को जोतने के लिए सब ओर ले जाते हैं (अग्निम्) खेती से अन्न प्राप्त होने पर अग्नि को भोजनपाकार्थ (परि-अहृषत) सब ओर प्रज्वलित करते हैं (देवेषु) विद्वानों के निमित्त तथा देवयज्ञ होम के निमित्त (श्रवः-अक्रत) अन्न को देते हैं और होम में आहुति देते हैं (कः-इमान्) कौन दुष्काल आदि इन प्राणियों को (आ-दधर्षति) पीड़ित करता है अर्थात् कोई नहीं ॥५॥
भावार्थभाषाः - जब वर्षा हो जाती है, तो किसान लोग बैलों से खेत जोतते हैं, खेतों में अन्न उत्पन्न होने पर अग्नि में भोजन बनाकर खाते हैं, विद्वानों के निमित्त अन्न प्रदान करते हैं और यज्ञ में भी होमते हैं, इस प्रकार अकेले अन्न नहीं खाना चाहिये, इस प्रकार करने पर दुर्भिक्ष पीड़ित नहीं करता ॥५॥
472 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वेदवाणी के साथ परिणय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इमे) = गत मन्त्र में वर्णित जितेन्द्रिय पुरुष (गां परि अनेषत) = वेदवाणी रूप गौ के साथ अपना परिणय करते हैं । ज्ञान की वाणियों को अपनाते हैं। (अग्निं परि अहृषत) = यज्ञों के लिये अग्नि को चारों ओर स्थापित करते हैं [अहरन् - स्थापितवन्तः] । यज्ञों को अपनाते हैं । [२] ये लोग (देवेषु) = माता, पिता, आचार्य आदि देवों के चरणों में आसीन [स्थित] होकर (श्रवः अक्रत) = ज्ञान का सम्पादन करते हैं अथवा (देवेषु) = दिव्य गुणों के विषय में (श्रवः अक्रत) = यश को प्राप्त करते हैं। अर्थात् दिव्यगुणों का धारण करते हैं । (कः) = कौन (इमान्) = इनको (आदधर्षति) = कुचल सकता है। अर्थात् इस प्रकार जीवन को बनाने पर ये काम - क्रोध-लोभ आदि से कुचले नहीं जाते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वेदवाणी को अपनाकर ज्ञानी बनें। यज्ञों को सिद्ध कर कर्मकाण्डी हों । दिव्य गुणों का सम्पादन करते हुए पवित्र हृदय व प्रभु के उपासक हों । वासनाओं से बचने का यही मार्ग है। इस सूक्त में अदानवृत्ति की हेयता का प्रतिपादन करके उसके उन्मूलन के लिये उपायों का संकेत है । अदानवृत्ति से ऊपर उठकर मनुष्य उन्नतिपथ पर आगे बढ़ता है, 'आग्नेय' होता है । यह लोभ से ऊपर उठ जाने के कारण ज्ञानी बनता है 'केतु' । यही अगले सूक्त का ऋषि है-
472 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इमे) एते कृषकाः (गां परि-अनेषत) गाः-बलीवर्दान् ‘मन्त्रजात्यामेकवचनम्’ कृषिकरणाय परितः सर्वतो नयन्ति “णीञ् प्रापणे” [भ्वादि०] ततो लङ् सिप् अट् च छान्दसौ (अग्निं-परि-अहृषत) कृषितोऽन्नं प्राप्याग्निं भोजनपाकार्थं परितः सर्वतो ज्वालयन्ति (देवेषु श्रवः-अक्रत) तथा देवेषु विद्वन्निमित्तं देवयज्ञे होमे चान्नम् “श्रवोऽन्ननाम” [निघ० २।७] हुतं कुर्वन्ति पुनः (कः-इमान्-आदधर्षति) कः खलु दुष्कालादिः खल्वेतान् प्राणिनः पीडयति न कश्चन ॥५॥
472 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - These farmers lead the bullocks to the fields. They light the fires all round to cook and for yajna. They offer libations to the fire for natural forces. Who can push them down to the state of poverty and misfortune? (None.)