पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु को (दारु) = काष्ठमयी नाव के रूप में चित्रित किया है। यह नाव (अपूरुष) = अलौकिक है, किसी मनुष्य से नहीं बनायी गई। इस नाव के द्वारा ही हम भवसागर को तैर पाते हैं । (अदः) = वह (यत्) = जो (अपूरुषम्) = अलौकिक (दारु) = नाव (सिन्धोः पारे) = भवसागर को पार करने के निमित्त (प्लवते) = गतिवाली होती है, (तद्) = उस नाव को (आरभस्व) = तू आश्रय बना । उस नाव को तू पकड़, उसका सहारा ले । [२] (दुर्हणः) = हे सब बुराइयों के हनन करनेवाले जीव ! (तेन) = उस नाव से (परस्तरम्) = तू उत्कृष्ट परले पार को (गच्छ) = जानेवाला हो । प्रभु रूप नाव ही तुझे भवसागर के पार करेगी। यह संसार - नदी विषयों की चट्टानों से बड़ी बीहड़ है, इसे तू इस प्रभु रूप नाव से ही पार कर पायेगा। प्रभु को अपनाने पर ही विषयों से ऊपर उठकर तू दानवृत्तिवाला बनेगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- संसार एक विषयों के ग्राहों से भयंकर बने हुए समुद्र के समान है। इसे प्रभु रूप नाव के द्वारा ही पार किया जा सकता है।