वांछित मन्त्र चुनें

अ॒दो यद्दारु॒ प्लव॑ते॒ सिन्धो॑: पा॒रे अ॑पूरु॒षम् । तदा र॑भस्व दुर्हणो॒ तेन॑ गच्छ परस्त॒रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ado yad dāru plavate sindhoḥ pāre apūruṣam | tad ā rabhasva durhaṇo tena gaccha parastaram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒दः । यत् । दारु॑ । प्लव॑ते । सिन्धोः॑ । पा॒रे । अ॒पु॒रु॒षम् । तत् । आ । र॒भ॒स्व॒ । दु॒र्ह॒नो॒ इति॑ दुःऽहनो । तेन॑ । ग॒च्छ॒ । प॒रः॒ऽत॒रम् ॥ १०.१५५.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:155» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


966 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धोः पारे) समुद्र के पार जाने के निमित्त (यत्-अदः) जो वह (अपूरुषं दारु) पुरुषरहित काष्ठमय नौकारूप (प्लवते) तैरती है (दुर्हणो) हे दुर्हननीय अहिंस्य विद्वन् ! (तत्-आ रभस्व) उसका अवलम्बन कर-उस पर आरोहण कर (तेन-परस्तरं गच्छ) उसके द्वारा अति दूर देश को अन्न लाने के लिए जा ॥३॥
भावार्थभाषाः - जब अपने देश में दुर्भिक्ष-आपत्ति हो जावे, तो दूर देशों से अन्न लाने के लिए समुद्र के पार जाने को यन्त्रचालित नौका-जहाज से अन्न लाना चाहिये ॥३॥
966 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु रूप नाव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु को (दारु) = काष्ठमयी नाव के रूप में चित्रित किया है। यह नाव (अपूरुष) = अलौकिक है, किसी मनुष्य से नहीं बनायी गई। इस नाव के द्वारा ही हम भवसागर को तैर पाते हैं । (अदः) = वह (यत्) = जो (अपूरुषम्) = अलौकिक (दारु) = नाव (सिन्धोः पारे) = भवसागर को पार करने के निमित्त (प्लवते) = गतिवाली होती है, (तद्) = उस नाव को (आरभस्व) = तू आश्रय बना । उस नाव को तू पकड़, उसका सहारा ले । [२] (दुर्हणः) = हे सब बुराइयों के हनन करनेवाले जीव ! (तेन) = उस नाव से (परस्तरम्) = तू उत्कृष्ट परले पार को (गच्छ) = जानेवाला हो । प्रभु रूप नाव ही तुझे भवसागर के पार करेगी। यह संसार - नदी विषयों की चट्टानों से बड़ी बीहड़ है, इसे तू इस प्रभु रूप नाव से ही पार कर पायेगा। प्रभु को अपनाने पर ही विषयों से ऊपर उठकर तू दानवृत्तिवाला बनेगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- संसार एक विषयों के ग्राहों से भयंकर बने हुए समुद्र के समान है। इसे प्रभु रूप नाव के द्वारा ही पार किया जा सकता है।
966 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धोः-पारे) समुद्रस्य पारनिमित्तं पारकरणाय (यत्-अदः-अपूरुषं दारु प्लवते) यत् तत् पुरुषरहितं स्वयं यन्त्रचालितं दारुमयं नौकारूपं पोतमातरति (दुर्हणो) हे दुर्हननीय ! अहिंस्य  ब्रह्मणस्पते विद्वन् ‘दुःपूर्वकहनधातोः-उप्रत्ययः-औणादिकः’ (तत्-आरभस्व) तदा-युङ्क्ष्वारोह (तेन परस्तरं गच्छ) तेन अतिदूरं देशं गच्छन्नन्नमानेतुमित्यर्थः ॥३॥
966 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man destroyer of want and deprivation, see that unmanned wooden boat that floats on water to cross the flood, take to that and sail to the other side (to fight out this want through enterprise and initiative).