पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयम्) = यह सोम (अस्मासु) = हमारे में (काव्यः) = क्रान्तदर्शित्व व तत्त्वज्ञान को पैदा करनेवाला है। सोम के रक्षण से बुद्धि तीव्र होती है और हम तत्त्वज्ञान को प्राप्त करनेवाले बनते हैं । (ऋभुः) = यह खूब दीप्त होनेवाला है, दीप्ति व तेजस्विता का साधक होता है । (दास्वते) = प्रभु प्रति अपना अर्पण करनेवाले के लिये यह (वज्रः) = 'शत्रूणां वर्जकः ' शत्रुओं का वर्जक होता है । यह शरीर में रोगों को नहीं आने देता तो मन में वासनाओं को नहीं आने देता । [२] (अयम्) = यह सोम (ऊर्ध्वकृशनम्) = [कृशनं रूपनाम नि०] उत्कृष्ट रूपवाले (मदम्) = आनन्दमय स्वभाववाले व्यक्ति का (बिभर्ति) = धारण करता है । वस्तुतः सोम का धारण ही उस पुरुष को उत्कृष्ट रूपवाला व प्रसन्न मनोवृत्तिवाला बनाता है । (ऋभुः न) = यह सोम खूब दीप्त होनेवाले के समान होता हुआ (कृत्व्यम्) = कर्त्तव्यपालन में उत्तम (मदम्) = आनन्दमय स्वभावाले पुरुष का धारण करता है । अर्थात् सोम का रक्षण हमें कर्त्तव्यपालन की वृत्तिवाला तथा प्रसन्नचित्त बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से क्रान्तदर्शित्व, दीप्ति, शत्रुवर्जनशक्ति, उत्कृष्टरूप, प्रसन्नता तथा कर्त्तव्यपालन की वृत्ति प्राप्त होती है ।