पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आप:) = जल (इद वा उ) = निश्चय से (भेषजी:) = औषध हैं। ये (आपः) = जल (अमीव- चातनी:) = रोगों का विनाश करनेवाले हैं। (आप:) = जल (सर्वस्य भेषजी:) = सब रोगों के औषध हैं। (ता) = वे जल (ते) = तेरे लिए (भेषजं कृण्वन्तु) = औषध को करें। [२] जल को उबालने से सोलह ग्राम जल का पन्द्रह ग्राम रह जाए तो इस उबले हुए जल में शक्ति द्विगुणित हो जाती है। चौदह ग्राम रह जाने पर यह शक्ति चौगुणी हो जाती है और तेरह ग्राम रह गया जल नवगुण शक्तिवाला हो जाता है। वस्तुतः वह जल [जल घातने] सब रोगों का घात करनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जल के अन्दर सब औषध हैं। ये जल मनुष्य को नीरोग बनाते हैं । सूचना – [क] प्रातः काल का जलपान, [ख] भोजन में बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा पानी पीना, [ग] पीने के लिए गरम [विशेषतः सर्दी में] स्नान के लिए ठण्डा पानी लेना [सादा], [घ] जब भी पीना धीमे-धीमे पीना। ये बातें बड़ी उपयोगी सिद्ध होंगी।