वांछित मन्त्र चुनें
546 बार पढ़ा गया

मुन॑यो॒ वात॑रशनाः पि॒शङ्गा॑ वसते॒ मला॑ । वात॒स्यानु॒ ध्राजिं॑ यन्ति॒ यद्दे॒वासो॒ अवि॑क्षत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

munayo vātaraśanāḥ piśaṅgā vasate malā | vātasyānu dhrājiṁ yanti yad devāso avikṣata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मुन॑यः । वात॑ऽरशनाः । पि॒शङ्गाः॑ । व॒स॒ते॒ । मला॑ । वात॑स्य । अनु॑ । ध्राजि॑म् । यन्ति॑ । यत् । दे॒वासः॑ । अवि॑क्षत ॥ १०.१३६.२

546 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:136» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वातरशनाः) वात जिनके नियन्त्रण करनेवाले हैं, ऐसे (पिशङ्गा) सुनहरे (मुनयः) मननीय मनन के योग्य (मला वसते) अन्धकारों को-ढाँपते हैं-नष्ट करते हैं (वातस्य ध्राजिम्) वायु के वेग को (अनु यन्ति) अनुगमन करते हैं (यत्-देवासः-अविक्षत) जो द्योतमान ग्रह नक्षत्र आकाशमण्डल में प्रविष्ट हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - सूर्य के अतिरिक्त अन्य पिण्ड आकाश में वातसूत्रों से खिंचे हुए सुनहरे चमचमाते हुए अन्धकार को मिटाते हुए वायु के वेग के समान गति करते हुए ग्रहतारे आकाश में वर्तमान हैं, उनका ज्ञान करना चाहिये ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु में प्रवेश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के (मुनयः) = मौन रहते हुए मननशील होते हैं, (वातरशनाः) = वायुरूप मेखलावाले होते हैं, अर्थात् [वात - प्राण] प्राणायाम के अभ्यासी बनते हैं। (पिशंगा:) = [पिश-free from sin] पापशून्यता की अवस्था की ओर जानेवाले होते हैं । प्राणायाम से दोषों को जलाकर निर्दोष व तेजस्वी बनते हैं [प्राणायामैर्दहेद् दोषान्] । ये मुनि (मला) = मलिन कर्मों का (वसते) = अपवरण करते हैं [वस्-छादने=अपवारणे] । मलिन कर्मों को अपने से दूर करके शुद्ध जीवनवाले बनते हैं । [२] (वातस्य) = प्राणों के (धाजिम्) = वेग व गति के (अनु) = अनुसार यन्ति ये प्रभु के मार्ग पर जाते हैं । जितना - जितना प्राणसाधना में आगे बढ़ते हैं, उतना उतना प्रभु की समीप होते जाते हैं । (यद्) = जब इस प्राणसाधना के द्वारा अशुभ वृत्तियों को विनष्ट करके ये (देवासः) = देव बन जाते हैं तब (अविक्षत) = ये उस प्रभु में प्रवेश करते हैं 'ज्ञातुं द्रष्टुं प्रवेष्टुं च' । मनन से प्रभु का ज्ञान हुआ, प्राणसाधना से दर्शन हुआ और देव बनने पर प्रवेश का प्रसंग आया ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मौनपूर्वक मनन में प्रवृत्त हों, प्राणसाधना करें, निर्मलता को प्राप्त करके देववृत्तिवाले बनकर, प्रभु में प्रवेश करें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वातरशनाः) वाता रशना नियन्तारो येषां ते (पिशङ्गा) पीतवर्णाः-स्वर्णवर्णाः (मुनयः) मननीयाः (मला वसते) मलानि मलिनानि कृष्णानि तमांसि-आच्छादयन्ति (वातस्य ध्राजिम्-अनु यन्ति) वातस्य वेगमनुगच्छन्ति (यत्-देवासः-अविक्षत) यतो देवासो ग्रहादयो द्युम्नमण्डलमभिविशन्ति ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Self-energised objects of space controlled by cosmic energy wear a dull yellow vestment and they follow the currents of cosmic energy when rays of the sun touch and affect their behaviour.$(Sages harmoniously self-controlled in tune with the currents of cosmic energy wear a soothing vestment of yellow hue, and when their senses become totally internalised, they identify their being with the cosmic energy of divinity.)