पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के (मुनयः) = मौन रहते हुए मननशील होते हैं, (वातरशनाः) = वायुरूप मेखलावाले होते हैं, अर्थात् [वात - प्राण] प्राणायाम के अभ्यासी बनते हैं। (पिशंगा:) = [पिश-free from sin] पापशून्यता की अवस्था की ओर जानेवाले होते हैं । प्राणायाम से दोषों को जलाकर निर्दोष व तेजस्वी बनते हैं [प्राणायामैर्दहेद् दोषान्] । ये मुनि (मला) = मलिन कर्मों का (वसते) = अपवरण करते हैं [वस्-छादने=अपवारणे] । मलिन कर्मों को अपने से दूर करके शुद्ध जीवनवाले बनते हैं । [२] (वातस्य) = प्राणों के (धाजिम्) = वेग व गति के (अनु) = अनुसार यन्ति ये प्रभु के मार्ग पर जाते हैं । जितना - जितना प्राणसाधना में आगे बढ़ते हैं, उतना उतना प्रभु की समीप होते जाते हैं । (यद्) = जब इस प्राणसाधना के द्वारा अशुभ वृत्तियों को विनष्ट करके ये (देवासः) = देव बन जाते हैं तब (अविक्षत) = ये उस प्रभु में प्रवेश करते हैं 'ज्ञातुं द्रष्टुं प्रवेष्टुं च' । मनन से प्रभु का ज्ञान हुआ, प्राणसाधना से दर्शन हुआ और देव बनने पर प्रवेश का प्रसंग आया ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मौनपूर्वक मनन में प्रवृत्त हों, प्राणसाधना करें, निर्मलता को प्राप्त करके देववृत्तिवाले बनकर, प्रभु में प्रवेश करें।