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उ॒रु॒व्यचा॑ नो महि॒षः शर्म॑ यंसद॒स्मिन्हवे॑ पुरुहू॒तः पु॑रु॒क्षुः । स न॑: प्र॒जायै॑ हर्यश्व मृळ॒येन्द्र॒ मा नो॑ रीरिषो॒ मा परा॑ दाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uruvyacā no mahiṣaḥ śarma yaṁsad asmin have puruhūtaḥ purukṣuḥ | sa naḥ prajāyai haryaśva mṛḻayendra mā no rīriṣo mā parā dāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒रु॒ऽव्यचाः॑ । नः॒ । म॒हि॒षः । शर्म॑ । यं॒स॒त् । अ॒स्मिन् । हवे॑ । पु॒रु॒ऽहू॒तः । पु॒रु॒ऽक्षुः । सः । नः॒ । प्र॒ऽजायै॑ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । मृ॒ळ॒य॒ । इन्द्र॑ । मा । नः॒ । रि॒रि॒षः॒ । मा । परा॑ । दाः॒ ॥ १०.१२८.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:128» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उरुव्यचाः) बहुत व्याप्त (महिषः) महान्-अनन्त (पुरुहूतः) बहुत आमन्त्रण करने योग्य (पुरुक्षुः) बहुत अन्न देनेवाला परमात्मा (अस्मिन् हवे) इस यज्ञ में (नः) हमें (शर्म यंसत्) सुख देवे (सः) वह (हर्यश्व) हरणशील व्यापन स्वभाववाले (इन्द्र) परमात्मन् ! (नः) हमें (प्रजायै) प्रजा प्राप्ति के लिए (मृळय) सुखी कर (नः) हमें (मा-रीरिषः) मत पीड़ित कर (मा परादाः) न हमें त्याग ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा बहुव्यापी अनन्त अनेक प्रकार से आमन्त्रण करने योग्य बहुत अन्नभोग देनेवाला है, वह सन्तानप्राप्ति के द्वारा सुखी करता है, वह न हमें पीड़ा देता है, न त्यागता है, उस ऐसे परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु से रक्षित व अत्यक्त

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उरुव्यचाः) = वेद अनन्त विस्तारवाले, (महिषः) = पूजनीय प्रभु (नः) = हमारे लिए (शर्म यंसत्) = सुख व शरण को दें। (अस्मिन् हवे) = इस जीवन संग्राम में (पुरुहूतः) = वही खूब पुकारे जाने योग्य हैं, वही (पुरुक्षुः) = खूब स्तुति के योग्य हैं [क्षु शब्दे] । [२] (सः) = वे (हर्यश्व) = [हरी अश्वौ यस्य] जिन आपके दिये हुए ये इन्द्रियाश्व हमें लक्ष्य स्थान पर ले जानेवाले हैं, ऐसे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (नः) = हमारी (प्रजायै) = प्रजा के लिए (मृडय) = सुखी करिये। (नः) = हमें (मा रीरिषः) = मत हिंसित करिये। और (मा परा दाः) = हमें शत्रुओं के लिए मत दे डालिए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु से रक्षित होकर हम संग्राम में विजयी हों। हम कभी हिंसित न हों । प्रभु से हम कभी त्यक्त न हों ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उरुव्यचाः) बहुव्याप्तः (महिषः) महान्-अनन्तः (पुरुहूतः) बहुह्वातव्यः (पुरुक्षुः) बह्वन्नप्रदः परमात्मा (अस्मिन् हवे नः शर्म यंसत्) अत्र यज्ञेऽस्मभ्यं सुखं यच्छतु ददातु (सः) स खलु (हर्यश्व-इन्द्र) हरणशील व्यापनस्वभाववन् “हर्यश्व हरणशीला व्यापनस्वभावा यस्य तत्सम्बुद्धौ” [ऋ० ३।३२।५ दयानन्दः] ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (नः प्रजायै मृडय) अस्मान् प्रजायै-प्रजाप्राप्तये सुखय (नः-मा रीरिषः) अस्मान् न पीडय (मा परादाः) नास्मान् त्यज ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, all pervasive lord of the expansive universe, infinitely potent, universally invoked and adored, infinitely opulent and generous, may, we pray, give us peace and fulfilment in this great war-like yajna of life. O lord of the dynamics of existence, Indra, we pray give us the joy of fulfilment for our people and for our future generations, pray never hurt us, never forsake us.