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मह्यं॑ यजन्तु॒ मम॒ यानि॑ ह॒व्याकू॑तिः स॒त्या मन॑सो मे अस्तु । एनो॒ मा नि गां॑ कत॒मच्च॒नाहं विश्वे॑ देवासो॒ अधि॑ वोचता नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mahyaṁ yajantu mama yāni havyākūtiḥ satyā manaso me astu | eno mā ni gāṁ katamac canāhaṁ viśve devāso adhi vocatā naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मह्य॑म् । य॒ज॒न्तु॒ । मम॑ । यानि॑ । ह॒व्या । आऽकू॑तिः । स॒त्या । मन॑सः । मे॒ । अ॒स्तु॒ । एनः॑ । मा । नि । गा॒म् । क॒त॒मत् । च॒न । अ॒हम् । विश्वे॑ । दे॒वा॒सः॒ । अधि॑ । वो॒च॒त॒ । नः॒ ॥ १०.१२८.४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:128» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मम) मेरी (यानि) जो (हव्या) ग्राह्य-ग्रहण करने योग्य वस्तुएँ (मह्यम्) मेरे लिये श्रेष्ठता से (यजन्त) सङ्गत हों-प्राप्त हों (मे) मेरे (मनसः) मन की (आकूतिः) सङ्कल्पधारा (सत्या-अस्तु) यथार्थ या सफल हो (एनः कतमत्-चन) पाप को कदापि (मा निगाम्) मत प्राप्त होऊँ (विश्वे देवासः) सब विद्वान् (नः) हमें मुझे (अधि वोचत) अपने अधीन उपदेश करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - मानव के पास जितनी वस्तुएँ हों, आवश्यक हों, अनावश्यक संग्रह न हो, सङ्कल्पधारा यथार्थ सफलवाली अयथार्थ निष्फल न उठे, पाप को कभी न करे, विद्वानों से उपदेश सुनते रहना चाहिये ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सत्या आकूति [सत्य अभिप्राय]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मम यानि हव्या) = मेरी जो पुकारने योग्य चीजें हैं, जो आराधनीय वस्तुएँ हैं, वे (मह्यं यजन्तु) = मेरे लिए प्राप्त हों। सब देव उन्हें मेरे लिए देनेवाले हों। (मे मनसः) = मेरे मन की (आकूतिः) = कामना व संकल्प (सत्या अस्तु) = सत्य हो । मैं कभी अशुभ कामना करनेवाला न होऊँ । [२] इस प्रकार अशुभ कामनाओं से ऊपर उठकर (अहम्) = मैं (कतमच्चन) = किसी भी (एनः) = पाप को (मा निगाम्) = मत प्राप्त होऊँ । अशुभ का मजा ही अशुभ को पैदा करता है, शुभकामनाओंवाला होकर मैं शुभ को ही प्राप्त करूँ । (विश्वे देवासः) = सब देव व विद्वान् (नः) = हमें (अधिवोचता) = आधिक्येन उपदेश देनेवाले हों। उनके उपदेशों से सत्प्रेरणा को प्राप्त करता हुआ मैं कभी भी पाप की ओर न झुकूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रार्थित वस्तुओं को प्राप्त करें। हमारे संकल्प सत्य हों। हम निष्पाप हों । देवों से सत्प्रेरणा को सदा प्राप्त करें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मम यानि हव्या) मम पार्श्वे यानि ग्राह्याणि (मह्यं यजन्तु) मदर्थं श्रेष्ठतया सङ्गतानि भवन्तु (मे मनसः-आकूतिः) मम मनसः सङ्कल्पधारा (सत्या-अस्तु) यथार्था सफला वा भवतु (एनः कतमत्-चन) पापं कदापि (मा नि गाम्) नाहं प्राप्नुयां (विश्वे देवासः नः-अधि वोचत) हे सर्वे विद्वांसः स्वाधीने मामुपदिशत ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May my havis that I offer in yajna bring me the success I plan. May the thoughts and intentions of my mind be true and fruitful. May I never take to sin or evil whatsoever. O divinities of the world, bless us and say: May all be well with you!