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या॒वया॑ वृ॒क्यं१॒॑ वृकं॑ य॒वय॑ स्ते॒नमू॑र्म्ये । अथा॑ नः सु॒तरा॑ भव ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yāvayā vṛkyaṁ vṛkaṁ yavaya stenam ūrmye | athā naḥ sutarā bhava ||
पद पाठ
य॒वय॑ । वृ॒क्य॑म् । वृक॑म् । य॒वय॑ । स्ते॒नम् । ऊ॒र्म्ये॒ । अथ॑ । नः॒ । सु॒ऽतरा॑ । भ॒व॒ ॥ १०.१२७.६
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:127» मन्त्र:6
| अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:14» मन्त्र:6
| मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:6
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ऊर्म्ये) हे रात्रि ! (वृक्यं वृकं यवय) भेड़ियन भेड़िये घातक पशु को हमारे से पृथक् कर सुला दे (स्तेनं यवय) चोर को हमसे पृथक् कर सुला दे (अथ न सुतरा भव) हमारे लिए सुख से बीतनेवाली हो ॥६॥
भावार्थभाषाः - रात्रि में मनुष्य सो जाते हैं। सो जाने पर भेड़िये आदि जङ्गली पशु एवं चोरों के आक्रमण की सम्भावना रहती है। मानव की भावना है कि वे हमारे ऊपर आक्रमण न करें और सो जावें, या हम ऐसे गहरे न सोएँ, जिससे वे सता सकें ॥६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
निर्भय - निद्रा
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार रात्रि विश्राम काल तो है, परन्तु यदि उस समय हिंस्र पशुओं का भय बना हुआ हो अथवा चोरों का भय हो तो नींद सम्भव नहीं। सो कहते हैं कि हे (ऊर्म्ये) = रात्रि ! सारे संसार को अन्धकार से आच्छादित करनेवाली रात्रि ! [ऊर्णुञ् आच्छादने] (वृक्यं वृकम्) = वृकी और वृक-भेड़ियों को (यावया) = हमारे से दूर करो। राजा इस प्रकार व्यवस्था करे कि बस्तियों के समीप इन हिंसक पशुओं के आने का सम्भव न हो। इसी प्रकार (स्तेनम्) = चोर को (यवय) = हमारे से पृथक् करो। रात्रि में रक्षा-पुरुषों की ठीक व्यवस्था के कारण चोरों का भी भय न हो। [२] इस प्रकार हिंस्र पशुओं व चोरों के भय से रहित होकर उत्तम नींद को देती हुई तू (नः) = हमारे लिए (सुतराभव) = शरीरों के रोगों व मानस ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध आदि विकारों से ठीक प्रकार से तरानेवाली, दूर करनेवाली हो। रोगी सो जाए तो उसका आधा रोग ही दूर हो जाता है और क्रोध से तमतमाता हुआ पुरुष सो जाए तो अगले दिन बिलकुल क्रोध से शून्य होता है । एवं यह रात्रि हमें आधि-व्याधियों से तरानेवाली है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हिंसक पशुओं व चोरों के भय से रहित होकर हम ठीक नींद को प्राप्त करें और आधि-व्याधियों से ऊपर उठें।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ऊर्म्ये) हे रात्रे ! “ऊर्म्या रात्रिनाम” [निघ० १।७] (वृक्यं वृकं यवय) वृकभार्यां वृकं च घातकं जाङ्गलपशुमस्मत्तो निवारय स्वापय (स्तेनं-यवय) चोरञ्च यवयास्मत्तः पृथक्कुरु तं स्वापय (अथ न-सुतरा भव) अथ चास्मभ्यं सुखप्रदा भव ॥६॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O peaceful night, keep away the wolf and the wolfish deeds. Keep away the thief. Fold them in sleep. Be peaceable, soothing and refreshing for us.
