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नेता॑र ऊ॒ षु ण॑स्ति॒रो वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा । अति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता राजा॑नश्चर्षणी॒नामति॒ द्विष॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

netāra ū ṣu ṇas tiro varuṇo mitro aryamā | ati viśvāni duritā rājānaś carṣaṇīnām ati dviṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नेता॑रः । ऊँ॒ इति॑ । सु । नः॒ । ति॒रः । वरु॑णः । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । अति॑ । विश्वा॑नि । दुः॒ऽइ॒ता । राजा॑नः । च॒र्ष॒णी॒नाम् । अति॑ । द्विषः॑ ॥ १०.१२६.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:126» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:13» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वरुणः-मित्रः-अर्यमा) वरुण मित्र, अर्यमा (नः-चर्षणीनां राजानः-नेतारः) हम मनुष्यों के राजा के समान रक्षक नेता हैं (विश्वानि दुरितानि) सब दुःखों को (उ सु-अति तिरः) भलीभाँति तिरस्कृत करते हैं, (द्विषः-अति) द्वेष करनेवालों का अतिक्रमण करके हम-स्थित होवें ॥६॥
भावार्थभाषाः - वरुण, मित्र, अर्यमा, मनुष्यों के राजमान रक्षक हैं, सारे दुःखों को तिरस्कृत करते हैं, हम द्वेष करनेवालों का अतिक्रमण करके स्थित होवें ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अति विश्वानि दुरिता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वरुणः) = द्वेष निवारण की देवता, (मित्रः) = स्नेह की देवता तथा (अर्यमा) = [अदीन् यच्छति] काम-क्रोध आदि को पराजित करने की देवता, ये सब (उ) = निश्चय से (सु) = अच्छी प्रकार (नः) = हमें (तिरः नेतारः) = [तिर : aeross, beyond, oner] पार ले जानेवाले हैं । [२] ये (विश्वानि दुरिता) = सब दुरितों से अति अतिक्रान्त करके हमें सुवितों में प्राप्त करानेवाले हैं। (चर्षणीनां राजान:) = श्रमशील व्यक्तियों के जीवनों को व्यवस्थित करनेवाले ये 'वरुण-मित्र अर्यमा' (द्विषः अति) = हमें शत्रुओं से पार ले जानेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वरुण-मित्र - अर्यमा हमें दुरितों से दूर करके सुन्दर जीवनवाला बनाएँ ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वरुणः-मित्रः-अर्यमा नः-चर्षणीनां राजानः-नेतारः) वरुणः, मित्रः, अर्यमाऽस्माकं मनुष्याणां राजमानाः-नेतारः (विश्वानि दुरितानि-उ सु-अति तिरः) सर्वाणि-दुःखानि खलु सम्यगत्यन्तं तिरस्कुर्वन्ति (द्विषः-अति) द्वेष्टॄन् विरोधिनश्चातिक्रम्य स्थिता भवेम ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May Varuna, Mitra and Aryama, leaders and brilliant rulers of the people, judicious, loving and nobly motivated, safely pilot us across all sin and evil of the world and all forces of hate, jealousy and enmity of society.