अन्तः संग्राम व बहि संग्राम के करनेवाले प्रभु
पदार्थान्वयभाषाः - [१] राष्ट्र में प्रजाओं के कष्टों का निवारण करनेवाला राजा रुद्र है [ रुत् कष्टं द्रावयति ] । यह अपने धनुष् से प्रजा पीड़कों का संहार करता है। इसके लिए इन धनुष् आदि साधनों को प्राप्त करानेवाले प्रभु ही हैं । (अहम्) = मैं ही (रुद्राय) = इस प्रजा कष्ट विद्रावक राजा के लिए (धनुः) = धनुष को (आतनोमि) = ज्या इत्यादि से युक्त करता हूँ। जिससे वह राजा ब्रह्मद्विषे ज्ञान के साथ प्रीति न रखनेवाले (शरवे) = हिंसक पुरुष के हन्तवा उ निश्चय से हनन के लिए समर्थ हो सके। इस प्रकार राजा राष्ट्र की उन्नति में विघ्नभूत लोगों को उचित दण्ड देने का सामर्थ्य उस प्रभु से ही प्राप्त करता है । [२] लोगों का जो अपने अन्तःशत्रु काम-क्रोधादि से युद्ध चलता है उस युद्ध में भी प्रभु ही विजय प्राप्त कराते हैं। (अहम्) = मैं ही जनाय लोगों के लिए (समदम्) = [समत् = संग्राम] संग्राम को (कृणोमि) = करता हूँ । प्रभु ही इन कामादि शत्रुओं का संहार करते हैं। (अहम्) = मैं ही द्यावापृथिवी आविवेश सम्पूर्ण द्युलोक व पृथिवी लोक में व्याप्त हो रहा हूँ। सर्वत्र मेरी शक्ति ही काम कर रही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा को राष्ट्रपालन की शक्ति प्रभु से ही प्राप्त होती है। एक मनुष्य को काम- क्रोधादि को जीतने की शक्ति भी प्रभु ही देते हैं।