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अ॒हं रु॒द्राय॒ धनु॒रा त॑नोमि ब्रह्म॒द्विषे॒ शर॑वे॒ हन्त॒वा उ॑ । अ॒हं जना॑य स॒मदं॑ कृणोम्य॒हं द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ahaṁ rudrāya dhanur ā tanomi brahmadviṣe śarave hantavā u | ahaṁ janāya samadaṁ kṛṇomy ahaṁ dyāvāpṛthivī ā viveśa ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒हम् । रु॒द्राय॑ । धनुः॑ । आ । त॒नो॒मि॒ । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषे॑ । शर॑वे । हन्त॒वै । ऊँ॒ इति॑ । अ॒हम् । जना॑य । स॒ऽमद॑म् । कृ॒णो॒मि॒ । अ॒हम् । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । आ । वि॒वे॒श॒ ॥ १०.१२५.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:125» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मद्विषे) ब्राह्मणों के प्रति द्वेष करनेवाले (रुद्राय) क्रूर (शरवे) हिंसक को (हन्तवै-उ) हनन करने के हेतु (अहं धनुः-आ तनोमि) मैं धनुषशस्त्र को साधती हूँ (अहं जनाय) जनहितार्थ (समदं कृणोमि) मैं अहङ्कारी के साथ संग्राम करती हूँ (अहं द्यावापृथिवी) मैं द्यावापृथिवी में भलीभाँति (आ विवेश) प्रविष्ट होकर रहती हूँ ॥६॥
भावार्थभाषाः - पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति ब्राह्मण के प्रति द्वेष करनेवाले क्रूर हिंसक जन को हनन करने के लिये धनुषशस्त्र को सिद्ध करना चाहिये और संग्राम में चलाना चाहिये। वह द्यावापृथिवीमय सब जगत् में आविष्ट होकर वर्त्तमान है ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अन्तः संग्राम व बहि संग्राम के करनेवाले प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] राष्ट्र में प्रजाओं के कष्टों का निवारण करनेवाला राजा रुद्र है [ रुत् कष्टं द्रावयति ] । यह अपने धनुष् से प्रजा पीड़कों का संहार करता है। इसके लिए इन धनुष् आदि साधनों को प्राप्त करानेवाले प्रभु ही हैं । (अहम्) = मैं ही (रुद्राय) = इस प्रजा कष्ट विद्रावक राजा के लिए (धनुः) = धनुष को (आतनोमि) = ज्या इत्यादि से युक्त करता हूँ। जिससे वह राजा ब्रह्मद्विषे ज्ञान के साथ प्रीति न रखनेवाले (शरवे) = हिंसक पुरुष के हन्तवा उ निश्चय से हनन के लिए समर्थ हो सके। इस प्रकार राजा राष्ट्र की उन्नति में विघ्नभूत लोगों को उचित दण्ड देने का सामर्थ्य उस प्रभु से ही प्राप्त करता है । [२] लोगों का जो अपने अन्तःशत्रु काम-क्रोधादि से युद्ध चलता है उस युद्ध में भी प्रभु ही विजय प्राप्त कराते हैं। (अहम्) = मैं ही जनाय लोगों के लिए (समदम्) = [समत् = संग्राम] संग्राम को (कृणोमि) = करता हूँ । प्रभु ही इन कामादि शत्रुओं का संहार करते हैं। (अहम्) = मैं ही द्यावापृथिवी आविवेश सम्पूर्ण द्युलोक व पृथिवी लोक में व्याप्त हो रहा हूँ। सर्वत्र मेरी शक्ति ही काम कर रही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा को राष्ट्रपालन की शक्ति प्रभु से ही प्राप्त होती है। एक मनुष्य को काम- क्रोधादि को जीतने की शक्ति भी प्रभु ही देते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मद्विषे रुद्राय शरवे) ब्राह्मणानां द्वेष्टारं क्रूरं हिंसकम् ‘सर्वत्र द्वितीयायां चतुर्थी व्यत्ययेन’ (हन्तवै-उ) हन्तुं खलु “तुमर्थे से… तवैतवेङ्तवेनः” [अष्टा० ३।४।९] इति तवै प्रत्ययः (अहं धनुः-आ तनोमि) अहं धनुः साधयामि (अहं जनाय समदं कृणोमि) अहं जनमात्राय-जनहितार्थे तदहितकारिणा सह सङ्ग्रामं करोमि ‘सम् पूर्वकात्’ “मद तृप्तियोगे” [चुरादि०] क्विप्-अन्योऽन्यस्य रक्तपातं कृत्वा ‘सम्यक् तृप्यन्ति यत्र स सङ्ग्रामः’ (अहं द्यावापृथिवी) (आ विवेश) अहं द्युलोकपृथिवीलोकञ्च समन्तात्प्रविश्य तिष्ठामि ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I draw the bow for Rudra, powers of justice and punishment, to eliminate the forces of hate and violence against lovers and observers of piety and divinity. I fight for the people and create felicity and joy for them, and I reach and pervade the heaven and earth.