प्रभु प्रिय व्यक्ति का जीवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि श्रद्धा - लभ्य ज्ञान मैं ही प्राप्त कराता हूँ । उसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि (अहं एव) = मैं ही (स्वयम्) = अपने आप (इदम्) = इस ज्ञान को (वदामि) = उच्चरित करता हूँ, जो ज्ञान (देवेभिः जुष्टम्) = देवताओं से प्रीतिपूर्वक सेवित होता है, (उत) = और (मानुषेभिः) = विचारशील पुरुषों से वह ज्ञान सेवित होता है। प्रभु से दिये जाते हुए इस अन्तर्ज्ञान को देव और मनुष्य ही सुनते हैं। इन्हीं का इस ज्ञान की ओर झुकाव होता है। सामान्य मनुष्य इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उत्कण्ठित नहीं होता । [२] इस प्रकार मनुष्यों के सामान्यतया दो विभाग हो जाते हैं। एक वे जो देववृत्ति के बनकर ज्ञान की ओर झुकाववाले होते हैं। और दूसरे वे जो भोग प्रधान जीवनवाले बनकर ईश्वर से विमुख रहते हैं। स्पष्ट है कि देव प्रभु के प्रिय होते हैं । (यम्) = जिनको (कामये) = मैं चाहता हूँ, जो मेरे प्रिय बनते हैं (तं तम्) = उन- उनको मैं (उग्रं कृणोमि) = तेजस्वी बनाता हूँ, (तं ब्रह्माणम्) = उनको मैं ज्ञानी बनाता हूँ, (तं ऋषिम्) = उनको द्रष्टा व गतिशील बनाता हूँ तं सुमेधाम् उनको उत्तम मेधावाला बनाता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्रिय व्यक्ति तेजस्वी ज्ञानी व ऋषि तुल्य और सुमेधा बनता है। आसुरवृत्तिवाले लोग भोग प्रधान जीवन को बिताने से निस्तेज व ज्ञानविमुख गलत दृष्टिकोणवाले दुर्बुद्धि हो जाते हैं।