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अ॒हमे॒व स्व॒यमि॒दं व॑दामि॒ जुष्टं॑ दे॒वेभि॑रु॒त मानु॑षेभिः । यं का॒मये॒ तंत॑मु॒ग्रं कृ॑णोमि॒ तं ब्र॒ह्माणं॒ तमृषिं॒ तं सु॑मे॒धाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aham eva svayam idaṁ vadāmi juṣṭaṁ devebhir uta mānuṣebhiḥ | yaṁ kāmaye taṁ-tam ugraṁ kṛṇomi tam brahmāṇaṁ tam ṛṣiṁ taṁ sumedhām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒हम् । ए॒व । स्व॒यम् । इ॒दम् । व॒दा॒मि॒ । जुष्ट॑म् । दे॒वेभिः॑ । उ॒त । मानु॑षेभिः । यम् । का॒मये॑ । तम्ऽत॑म् । उ॒ग्रम् । कृ॒णो॒मि॒ । तम् । ब्र॒ह्माण॑म् । तम् । ऋषि॑म् । तम् । सु॒ऽमे॒धाम् ॥ १०.१२५.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:125» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्-एव स्वयम्) मैं ही स्वयं (इदं वदामि) यह कहती हूँ (देवेभिः) ऋषियों द्वारा (उत) और (मानुषेभिः) मनुष्यों द्वारा (जुष्टम्) सेवन करने योग्य को (यं कामये) जिसको चाहती हूँ, पात्र मानती हूँ, (तं तम्) उस-उस को (उग्रम्) उत्कृष्ट (तं ब्रह्माणम्) उसे ब्रह्मा (तम्-ऋषिम्) उसे ऋषि (तं सुमेधाम्) उसे अच्छी मेधावाला (कृणोमि) करती हूँ, बनाती हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - पारमेश्वरी ज्ञान शक्ति ही देवों और साधारण मनुष्यों के द्वारा सत्सङ्ग में आये मनुष्य को तेजस्वी बनाती है, ब्रह्मा बनाती है, ऋषि बनाती है, अच्छी मेधावाला बनाती है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु प्रिय व्यक्ति का जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि श्रद्धा - लभ्य ज्ञान मैं ही प्राप्त कराता हूँ । उसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि (अहं एव) = मैं ही (स्वयम्) = अपने आप (इदम्) = इस ज्ञान को (वदामि) = उच्चरित करता हूँ, जो ज्ञान (देवेभिः जुष्टम्) = देवताओं से प्रीतिपूर्वक सेवित होता है, (उत) = और (मानुषेभिः) = विचारशील पुरुषों से वह ज्ञान सेवित होता है। प्रभु से दिये जाते हुए इस अन्तर्ज्ञान को देव और मनुष्य ही सुनते हैं। इन्हीं का इस ज्ञान की ओर झुकाव होता है। सामान्य मनुष्य इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उत्कण्ठित नहीं होता । [२] इस प्रकार मनुष्यों के सामान्यतया दो विभाग हो जाते हैं। एक वे जो देववृत्ति के बनकर ज्ञान की ओर झुकाववाले होते हैं। और दूसरे वे जो भोग प्रधान जीवनवाले बनकर ईश्वर से विमुख रहते हैं। स्पष्ट है कि देव प्रभु के प्रिय होते हैं । (यम्) = जिनको (कामये) = मैं चाहता हूँ, जो मेरे प्रिय बनते हैं (तं तम्) = उन- उनको मैं (उग्रं कृणोमि) = तेजस्वी बनाता हूँ, (तं ब्रह्माणम्) = उनको मैं ज्ञानी बनाता हूँ, (तं ऋषिम्) = उनको द्रष्टा व गतिशील बनाता हूँ तं सुमेधाम् उनको उत्तम मेधावाला बनाता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्रिय व्यक्ति तेजस्वी ज्ञानी व ऋषि तुल्य और सुमेधा बनता है। आसुरवृत्तिवाले लोग भोग प्रधान जीवन को बिताने से निस्तेज व ज्ञानविमुख गलत दृष्टिकोणवाले दुर्बुद्धि हो जाते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्-एव स्वयम्-इदं वदामि) अहं हि खल्वेवेदं स्वयं वदामि (देवेभिः-उत मानुषेभिः-जुष्टम्) ऋषिभिः-अथ च मनुष्यैः सेवितं (यं कामये) यं हि खल्विच्छामि पात्रं मन्ये (तं तम्-उग्रम्) तं तमुच्चं (तं ब्रह्माणम्) तं ब्रह्माणं (तम्-ऋषिम्) तमृषिं (तं सुमेधाम्) तं सुष्ठुमेधावन्तं (कृणोमि) करोमि सम्पादयामि ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And all this that is loved, adored and spoken by the sages and veteran scholars and even by average mortals of honest mind, take it that I, voice of divinity, speak it myself. Whosoever I love by virtue of his or her merit of nature, character and performance, I raise to brilliance, to piety worthy of a yajnic Brahma, to the vision of a poetic sage and high intelligence of an exceptional thinker.