वांछित मन्त्र चुनें
1208 बार पढ़ा गया

मया॒ सो अन्न॑मत्ति॒ यो वि॒पश्य॑ति॒ यः प्राणि॑ति॒ य ईं॑ शृ॒णोत्यु॒क्तम् । अ॒म॒न्तवो॒ मां त उप॑ क्षियन्ति श्रु॒धि श्रु॑त श्रद्धि॒वं ते॑ वदामि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mayā so annam atti yo vipaśyati yaḥ prāṇiti ya īṁ śṛṇoty uktam | amantavo māṁ ta upa kṣiyanti śrudhi śruta śraddhivaṁ te vadāmi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मया॑ । सः । अन्न॑म् । अ॒त्ति॒ । यः । वि॒ऽपश्य॑ति । यः । प्राणि॑ति । यः । ई॒म् । शृ॒णोति॑ । उ॒क्तम् । अ॒म॒न्तवः॑ । माम् । ते । उप॑ । क्षि॒य॒न्ति॒ । श्रु॒धि । श्रु॒त॒ । श्र॒द्धि॒ऽवम् । ते॒ । व॒दा॒मि॒ ॥ १०.१२५.४

1208 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:125» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मम) मेरे द्वारा अनुमोदित (सः-अन्नम्-अत्ति) वह भोजन खाता है (यः-विपश्यति) जो विशेष देखता है (यः प्राणिति) जो प्राण लेता है (यः-ईम्-उक्तं शृणोति) जो ही कहे हुए को सुनता है (माम्) मुझे (अमन्तवः) न माननेवाले हैं (ते) वे (उप क्षियन्ति) उपक्षय-नाश को प्राप्त होते हैं (ते) तुझे (श्रद्धिवम्) श्रद्धायुक्त सत्यवचन (वदामि) कहती हूँ (श्रुत-श्रुधि) हे विश्रुत-प्रसिद्ध सुन ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो खानेवाली-देखनेवाली, सुननेवाली पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति को नहीं मानते, तदनुसार आचरण नहीं करते, वे क्षीण हो जाते हैं, यह सत्य है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्वपालक प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मया) = मेरे से ही (सः) = वह (अन्नं अत्ति) = अन्न को खाता है (यः) = जो (विपश्यति) = विशिष्टरूप से देखता है, देखते हैं, परन्तु कुछ समझते नहीं, वे अत्यन्त स्थिर-सी अवस्था में पड़े हुए क्षुद्र जन्तु मेरे से ही भोजन को खाते हैं। इसी प्रकार (यः प्राणिति) = जो श्वासोच्छ्वास लेते हुए जीवन को बिता रहे हैं, वे भी मेरे से ही अन्न को प्राप्त करते हैं। केवल देखनेवालों से ये कुछ उत्कृष्ट हैं। इन से भी उत्कृष्ट वे हैं (ये) = जो (ईम्) = निश्चय से (अक्तं शृणोति) = कहे हुए को सुनते हैं। इस प्रकार श्रवण से ज्ञान की वृद्धिवाले मनुष्य भी मेरे से ही अन्न को खाते हैं । [२] (ते अमन्तवः) = वे मनन व विचार से शून्य होने के कारण मुझे न माननेवाले भोग प्रधान वृत्तिवाले व्यक्ति भी (मां उपक्षियन्ति) = मेरे आधार से ही निवास करते हैं। मेरे आधार से जीते हुए भी वे माया से मोहित हुए हुए मुझे नहीं देखते। [३] परन्तु प्रभु का प्रिय पुत्र तो वही है जो मायामूढ न बनकर प्रभु की प्रेरणा को सुनता है । हे (श्रुत) = अन्तः स्थित प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाले जीव ! (श्रुधि) = सुन । (श्रद्धिवम्) = [श्रद्धिः श्रद्धा तया युक्तं श्रद्धा यत्वेन तभ्यं ईदृशं ब्रह्मात्मकं वस्तु सा० ] श्रद्धा से लभ्य आत्मज्ञान को ते वदामि तेरे लिए मैं कहता हूँ । इस प्रभु की वाणी को सुननेवाला श्रद्धावान् पुरुष ही ज्ञान को प्राप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-देखनेवाले केवल श्वासोच्छ्वास लेनेवाले, सुननेवाले सभी प्रभु से ही अन्न को प्राप्त करते हैं। मनन रहित भोग प्रधान पुरुषों को भी प्रभु ही भोजन देते हैं और सुननेवालों को प्रभु ही ज्ञान देते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मया) मयाऽनुमोदितः (सः-अन्नम्-अत्ति) स भोजनं भक्षयति (सः-विपश्यति) स विशिष्टं पश्यति (यः प्राणिति) यः प्राणं गृह्णाति (यः-ईम्-उक्तं शृणोति) यश्चोक्तं वचनं शृणोति (माम्-अमन्तवः) मां न मन्यमानाः (ते-उप क्षियन्ति) ते खलूपक्षयं प्राप्नुवन्ति (ते) तुभ्यं (श्रद्धिवं वदामि) श्रद्धायुक्तं वचनं वदामि (श्रुत श्रुधि) विश्रुत-श्रवणे प्रसिद्ध ! मम वचनं शृणु ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O listener, listen, what I say to you is worth listening and doing in faith: Whoever sees whatever he sees, whoever breathes whatever he breathes, whoever hears what is said, he receives the food of life by me. Those who do not listen, do not care, do not believe what I say and neglect me, they waste away, they come to ruin.$(We may realise here that Vagambhmi is not only the voice of divinity, it is also the voice of the people who think and speak truly, positively and jointly whenever and wherever they happen to do so, whether it be in parliaments or assemblies or in the press or in the universities. And this voice must be invariably true and authentic.)