पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वसिष्ठाः) = गत मन्त्र के अनुसार ध्यान व यज्ञ से जीवन को उत्कृष्ट बनानेवाले लोग उत्तम निवासवाले (वाजिनं त्वा) = शक्तिशाली आपको (नि अह्वन्त) = निश्चय से पुकारते हैं। हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (वेधसः) = ये ज्ञानी पुरुष (विदथेषु) = ज्ञान यज्ञों में (गृणन्तः) = आपका स्तवन करते हैं। [२] हे प्रभो! आप इन (यजमानेषु) = यज्ञशील, उपासना व पूजा की वृत्तिवाले लोगों में (रायस्पोषम्) = धन के पोषण को (धारय) = धारण करिये। इन्हें जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन की कभी कमी न हो । (यूयम्) = आप सदा हमेशा (नः) = हमें (स्वस्तिभिः) = कल्याणों के द्वारा (पात) = रक्षित करिये। हम सदा आपसे रक्षित हुए हुए कल्याण को प्राप्त करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अपने जीवन को उत्तम बनानेवाले लोग शक्तिशाली प्रभु का स्मरण करते हैं। प्रभु इन्हें धन व कल्याण प्राप्त कराते हैं । सूक्त का भाव यही है कि प्रभु के स्मरण से ही जीवन उत्तम बनता है । वे प्रभु अद्भुत तेजस्वितावाले हैं, उपासक को भी तेजस्वी बनाते हैं । इसलिए मेधावी पुरुष प्रभु का ही अर्चन करता है । यह मेधावी = वेन ही अगले सूक्त का ऋषि है। यह प्रभु की ही कामना करता है [वेणू - चिन्तने] उस प्रभु की प्राप्ति के लिए ही गतिशील होता है [ वेणृ गतौ] उसी का ज्ञान प्राप्त करता है [वे - ज्ञाने]। यह ज्ञान की वाणियों को अपने अन्दर प्रेरित करता है-