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नि त्वा॒ वसि॑ष्ठा अह्वन्त वा॒जिनं॑ गृ॒णन्तो॑ अग्ने वि॒दथे॑षु वे॒धस॑: । रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानेषु धारय यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ni tvā vasiṣṭhā ahvanta vājinaṁ gṛṇanto agne vidatheṣu vedhasaḥ | rāyas poṣaṁ yajamāneṣu dhāraya yūyam pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि । त्वा॒ । वसि॑ष्ठाः । अ॒ह्व॒न्त॒ । वा॒जिन॑म् । गृ॒णन्तः॑ । अ॒ग्ने॒ । वि॒दथे॑षु । वे॒धसः॑ । रा॒यः । पोष॑म् । यज॑मानेषु । धा॒र॒य॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ १०.१२२.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:122» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे परमात्मन् ! (वसिष्ठाः) तेरे अन्दर अत्यन्त बसनेवाले उपासक (वेधसः) मेधावी जन (विदथेषु) अनुभवनीय अध्यात्मप्रसङ्गों में (त्वां वाजिनम्) तुझ अमृतान्न भोगवाले को (गृणन्तः) स्तुति करते हुए को (अह्वन्त) आमन्त्रित करते हैं (यजमानेषु) अध्यात्म के यजमानों उपासकों में (रायस्पोषम्) धन के पोष-यशोलाभ को (धारय) धारण करा (यूयम्) तू (स्वस्तिभिः) कल्याणकारी हाथों से (सदा नः पात) सदा हमारी रक्षा कर ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा में अत्यन्त बसानेवाले उपासक उसकी स्तुति से आमन्त्रित करते हैं, अमृतभोग चाहते हुए विविध धन आदि वस्तुओं के सार लाभ यश आदि को प्राप्त करते हैं सदुपयोग करके ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वसिष्ठों का प्रभु-स्मरण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वसिष्ठाः) = गत मन्त्र के अनुसार ध्यान व यज्ञ से जीवन को उत्कृष्ट बनानेवाले लोग उत्तम निवासवाले (वाजिनं त्वा) = शक्तिशाली आपको (नि अह्वन्त) = निश्चय से पुकारते हैं। हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (वेधसः) = ये ज्ञानी पुरुष (विदथेषु) = ज्ञान यज्ञों में (गृणन्तः) = आपका स्तवन करते हैं। [२] हे प्रभो! आप इन (यजमानेषु) = यज्ञशील, उपासना व पूजा की वृत्तिवाले लोगों में (रायस्पोषम्) = धन के पोषण को (धारय) = धारण करिये। इन्हें जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन की कभी कमी न हो । (यूयम्) = आप सदा हमेशा (नः) = हमें (स्वस्तिभिः) = कल्याणों के द्वारा (पात) = रक्षित करिये। हम सदा आपसे रक्षित हुए हुए कल्याण को प्राप्त करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अपने जीवन को उत्तम बनानेवाले लोग शक्तिशाली प्रभु का स्मरण करते हैं। प्रभु इन्हें धन व कल्याण प्राप्त कराते हैं । सूक्त का भाव यही है कि प्रभु के स्मरण से ही जीवन उत्तम बनता है । वे प्रभु अद्भुत तेजस्वितावाले हैं, उपासक को भी तेजस्वी बनाते हैं । इसलिए मेधावी पुरुष प्रभु का ही अर्चन करता है । यह मेधावी = वेन ही अगले सूक्त का ऋषि है। यह प्रभु की ही कामना करता है [वेणू - चिन्तने] उस प्रभु की प्राप्ति के लिए ही गतिशील होता है [ वेणृ गतौ] उसी का ज्ञान प्राप्त करता है [वे - ज्ञाने]। यह ज्ञान की वाणियों को अपने अन्दर प्रेरित करता है-

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे परमात्मन् ! (वसिष्ठाः) त्वयि-अतिशयेन वसितार उपासकाः (वेधसः) मेधाविनः “वेधसः मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] (विदथेषु) वेदनेषु अनुभवनीयाध्यात्मप्रसङ्गेषु (त्वां वाजिनम्) त्वाममृतान्नभोगवन्तं (गृणन्तः-अह्वयन्त) स्तुवन्तः आह्वयन्ति (यजमानेषु रायः पोषं धारय) अध्यात्मयज्ञस्य यजमानेषूपासकेषु धनस्य पोषं धारय न तु शोषं शोषकं दोषं (यूयं स्वस्तिभिः सदा नः पात) त्वम् “पूजार्थे बहुवचनम्” कल्याणकरैः सदाऽस्मान् रक्ष ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, men of light and vision established in divine consciousness invoke and adore you, light and spirit of cosmic power, and they celebrate your divine supremacy over nature and humanity. O victorious lord of universal knowledge, power and prosperity, pray bear and bring us the wealth of life’s health and excellence for the yajamanas. O sages and scholars of divinity and science of yajna, pray protect and promote us always with all round well being of life on earth.