पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुक्रतो) = हे उत्तम ज्ञान व शक्तिवाले प्रभो ! आप (यज्ञप्रिये) = यज्ञों के द्वारा आपको प्रीणित करनेवाले (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए (सुदुघाम्) = उत्तम ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली (विश्वधायसम्) = सबका धारण करनेवाली (इषम्) = प्रेरणा को (दुहन्) = [दुह प्रपूरणे] पूरित करनेवाले हैं। आप यज्ञशील को वह प्रेरणा प्राप्त कराते हैं जो उसके ज्ञान का वर्धन करती है तथा सबका धारण करती है । [२] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (घृतस्नुः) = आप दीप्ति के शिखर हैं [ सु-सानु] ऊँचे से ऊँचे ज्ञानवाले हैं । (त्रिः) = तीन प्रकार से (ऋतानि दीद्यत्) = ऋतों को दीप्त करते हुए, हमारे जीवन में 'ऋग्, यजु, साम' रूप से सत्य ज्ञान का प्रकाश करते हुए अथवा शरीर में स्वास्थ्य रूप ऋत को, मन में नैर्मल्य रूप ऋत को तथा बुद्धि में सूक्ष्मता व तीव्रता रूप ऋत को उत्पन्न करते हुए, (वर्तिः) = हमारे इन शरीर रूप गृहों तथा (यज्ञं) = उनके द्वारा चलनेवाले यज्ञों का (परियन्) = परिक्रमण करते हुए, रक्षण करते हुए (सुक्रतूयसे) हमें उत्तम उत्तम ज्ञान व शक्तिवाला बनाने की कामना करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें उत्कृष्ट प्रेरणा प्राप्त कराते हैं। हमारे स्वास्थ्य - मन के नैर्मल्य व बुद्धि की तीव्रता को करते हुए हमें ज्ञान व शक्ति से सम्पन्न करते हैं ।