पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अपः) कर्मों के (वर्धाय) = [वर्धनम् वर्धः ] वर्धन के लिये (वाम्) = आप दोनों द्युलोक व पृथिवीलोक को (अर्चामि) = मैं पूजित करता हूँ। ये मेरे शरीर व मस्तिष्क (घृतस्नू) = घृत का स्रावण करनेवाले हों। [घृत = दीप्ति ] मस्तिष्क में ज्ञान की दीप्ति हो। [घृत-मलक्षरण] शरीर मलों के क्षरण वाला हो, मलों के क्षरण से यह शरीर नीरोग हो । [२] (द्यावाभूमी) = ये ज्ञानदीप्त मस्तिष्क तथा क्षरित मलों वाला शरीर (रोदसी) = [क्रन्दसी] प्रभु का आह्वान करनेवाले होते हुए मे (शृणुतम्) = सदा मेरी बात सुननेवाले हों, अर्थात् मेरी अधीनता में हों, मेरे आज्ञावर्ती हों। अथवा ये प्रभु प्रेरणा को सुननेवाले हों। [३] (यद्) = जब (द्यावः) = ज्ञानी स्रोता [दिव्-द्युतिस्रुति] ज्ञानी भक्त, (अहा) = प्रतिदिन (असुनीतिम् अयन्) = प्राणों के मार्ग पर चलते हैं, अर्थात् उस जीवनमार्ग को अपनाते हैं जो प्राणशक्ति का वर्धन करनेवाला है तो (अत्र) = इस जीवन में (नः) = हमें (पितरा) = द्यावापृथिवी [द्यौष्पिता पृथिवी माता] मस्तिष्क व शरीर (मध्वा) = माधुर्य से (शिशीताम्) = संस्कृत कर दें । अर्थात् हमारी एक- एक क्रिया जहाँ माधुर्य के लिये हुए हो वहाँ हमारा ज्ञान भी माधुर्यपूर्ण हो तथा मधुरता से ही दूसरों तक पहुँचाया जाये । वस्तुतः द्यावाभूमी का माधुर्य से पूर्ण होना ही जीवन के विकास की पराकाष्ठा है । इनको ऐसा बनाना ही इसका अर्चन है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे मस्तिष्क व शरीर ज्ञान दीप्ति व क्षरित मलों वाले हों। हम प्राणरक्षण के मार्ग से चलें तथा अपने को मधुर बनायें ।