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उप॑ मा म॒तिर॑स्थित वा॒श्रा पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम् । कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
upa mā matir asthita vāśrā putram iva priyam | kuvit somasyāpām iti ||
पद पाठ
उप॑ । मा । म॒तिः । अ॒स्थि॒त॒ । वा॒श्रा । पु॒त्रम्ऽइ॑व । प्रि॒यम् । कु॒वित् । सोम॑स्य । अपा॑म् । इति॑ ॥ १०.११९.४
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:119» मन्त्र:4
| अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:26» मन्त्र:4
| मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:4
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (मा) मुझे (मतिः) मानसिक शक्ति या बुद्धि (उप-अस्थित) उपस्थित हो गयी मन्त्रकरण-मनन के लिये (वाश्रा) कामना-करती हुयी माता (प्रियं पुत्रम्-इव) प्रिय पुत्र-को जैसे उपस्थित हो जाती है, क्योंकि मैंने परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान किया ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाले की मानसिक शक्ति या बुद्धि उसको ऐसे सङ्गत हो जाती है, जैसे प्रिय पुत्र को चाहती हुयी माता सङ्गत होती है ॥४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
बुद्धि की तीव्रता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वाश्रा) = शब्दायमाना-रम्भाती हुई, धेनु (इव) = जैसे (प्रियं पुत्रम्) = अपने प्रिय वत्स [बछड़े] को प्राप्त होती है, अथवा वाश्रा उत्साहवर्धक शब्द बोलती हुई जैसे माता प्रिय पुत्र के समीप आती हैं, उसी प्रकार (मा) = मुझे (मतिः) = बुद्धि (उप अस्थित) = प्राप्त हो। (इति) = इसी कारण, इसी उद्देश्य से ही तो (कुवित्) = खूब ही (सोमस्य अपाम्) = मैंने सोम का पान किया है। सोमरक्षण से ही मुझे उत्कृष्ट बुद्धि प्राप्त हुई है। [२] रक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाला ईंधन यह सोम ही है। इस प्रकार सोमरक्षण से मैं तीव्र बुद्धि को प्राप्त करता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हमारी बुद्धि तीव्र होती है ।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (मा मतिः-उप-अस्थित) मां मतिरुपतिष्ठते मन्त्रकरणाय मननाय (वाश्रा-प्रियं पुत्रम्-इव) कामयमाना माता प्रियं पुत्रमुपतिष्ठते तद्वत् (कुवित्०) पूर्ववत् ॥४॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - My heart, mind and intelligence is stable and has stabilised me in the object of my divine love like the loving mother cow having reached its darling calf, for I have drunk of the soma of the divine spirit.
