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प्र वाता॑ इव॒ दोध॑त॒ उन्मा॑ पी॒ता अ॑यंसत । कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra vātā iva dodhata un mā pītā ayaṁsata | kuvit somasyāpām iti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । वाताः॑ऽइव । दोध॑तः । उत् । मा॒ । पी॒ताः । अ॒यं॒स॒त॒ । कु॒वित् । सोम॑स्य । अपा॑म् । इति॑ ॥ १०.११९.२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:119» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:26» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाताः-इव) वायुओं के समान (प्र दोधतः) प्रकृष्टरूप से कम्पाते हुए-झुलाते हुए परमात्मा के आनन्दरस (उत्-अयंसत) ऊँचे ले जाते हैं (कुवित् सोमस्य अपाम् इति) मैंने परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान किया ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का आनन्दरस बहुत पीने से उपासक को वायु के झौकों की भाँति वे आनन्दरस झुलाते हैं-झुमाते हैं ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्फूर्ति व उद्यम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कुवित्) = खूब ही (सोमस्य) = सोम का (अपां इति) = मैंने पान व रक्षण किया है, सो (पीता:) = अपने शरीर में ही व्याप्त किये हुए ये सोम मुझे (दोधतः) = वृक्षादिकों को कम्पित करते हुए (प्र वाताः इव) = प्रबल वायुओं की तरह (मा) = मुझे (उद् अयंसत) = उद्यमवाला करते हैं । [२] प्रबल वायु मार्ग में आनेवाले वृक्षों को कम्पित करता हुआ आगे बढ़ता है, इसी प्रकार सोमपान [= वीर्यरक्षण] करनेवाला व्यक्ति सब विघ्नों को जीतकर उद्योगवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमपान से शरीर में स्फूर्ति व उद्यम का संचार होता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाताः-इव प्र दोधतः-मा-उत्-अयंसत) वाताः-प्रबलवायवः कम्पयितार इव पीताः परमात्मानन्दरसाः मां निम्नस्थानाद् उद्यच्छन्ति-उच्चं नयन्ति यतः (कुवित् सोमस्य अपाम् इति) पूर्ववत् ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like impetuous winds have the exhilarations of the draughts of soma raised me to the state of ecstasy, as I have drunk the soma of the divine spirit.