मित्रासः न, द्यावः न [सूर्य की तरह तेजस्वी व ज्ञानदीप्त]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (अग्निः) = अग्रेणी हैं, हमें उन्नति के मार्ग पर आगे ले चलनेवाले हैं। (वसुः) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले हैं। (सहसः सूनर:) = बल के उत्तमता से प्राप्त करानेवाले हैं । उन्नतिपथ पर ले चलकर वे हमारे निवास को उत्तम बनाते हैं, इस निवास को उत्तम बनाने के लिए वे हमें शक्ति प्राप्त कराते हैं । ये प्रभु (सूरिभिः) = ज्ञानी (मर्तैः सह) = मनुष्यों के साथ (नृभिः) = उन्नतिपथ का आक्रमण करनेवाले मनुष्यों से स्तवे स्तवन किये जाते हैं । उन्नति के मार्ग पर चलनेवाले मनुष्य, ज्ञानियों के सम्पर्क में रहते हुए, प्रभु की स्तुति करनेवाले होते हैं । [२] (एवा) = इस प्रकार ये जो प्रभु स्तवन करनेवाले होते हैं वे (मित्रासः न) = [प्रमीतेः त्रायते] रोगों से बचानेवाले सूर्यों के समान होते हैं। नीरोग होते हुए ये सूर्य के समान तेजस्वी होते हैं । (सुधिताः) = ये सदा तृप्त होते हैं [सुधित= सुहित = तृप्त] इन्हीं के लिए 'आत्मतृप्तः' शब्द का प्रयोग होता है। (ऋतायवः) = ये सदा ऋत की कामनावाले होते हैं, इनके जीवन में अनृत के लिए स्थान नहीं होता । (द्युम्नैः) = ज्ञान-ज्योतियों से (द्यावः न) = ये सूर्यों के समान होते हैं । सूर्य जैसे सब अन्धकारों को विनष्ट कर देता है, इसी प्रकार इनके जीवन में ज्ञान-ज्योति वासनाओं के अन्धकार को विनष्ट कर देती है । ये सूर्यसम दीप्तिवाले लोग मानुषान् प्राकृत मनुष्यों में होनेवाले काम, क्रोध, लोभ आदि भावों को (अभिसन्ति) = अभिभूत कर लेते हैं। इन इतरजनों की भावनाओं को जीतकर ये दैवी वृत्तिवाले बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के उपासक सूर्य के समान तेजस्वी होते हुए नीरोग होते हैं। सूर्य के ही समान ज्ञान दीप्त होते हुए वासनान्धकार को विनष्ट करते हैं।