वांछित मन्त्र चुनें
537 बार पढ़ा गया

वि यस्य॑ ते ज्रयसा॒नस्या॑जर॒ धक्षो॒र्न वाता॒: परि॒ सन्त्यच्यु॑ताः । आ र॒ण्वासो॒ युयु॑धयो॒ न स॑त्व॒नं त्रि॒तं न॑शन्त॒ प्र शि॒षन्त॑ इ॒ष्टये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi yasya te jrayasānasyājara dhakṣor na vātāḥ pari santy acyutāḥ | ā raṇvāso yuyudhayo na satvanaṁ tritaṁ naśanta pra śiṣanta iṣṭaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि । यस्य॑ । ते॒ । ज्र॒य॒सा॒नस्य॑ । अ॒ज॒र॒ । धक्षोः॑ । न । वाताः॑ । परि॑ । सन्ति॑ । अच्यु॑ताः । आ । र॒ण्वासः॑ । युयु॑धयः । न । स॒त्व॒नम् । त्रि॒तम् । न॒श॒न्त॒ । प्र । शि॒षन्तः॑ । इ॒ष्टये॑ ॥ १०.११५.४

537 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:115» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अजर) हे जरारहित अग्रणेता परमात्मन् ! (यस्य ते) जिस तुझ (ज्रयसानस्य) विभु गतिवाले (धक्षोः) पापदाहक के (वाताः-न) वायुवों के समान व्याप्तिरूप वेग (अच्युताः) अनश्वर (वि परि सन्ति) विशेषरूप से सर्वत्र परिप्राप्त होते हैं (रण्वासः) स्तुति शब्द करनेवाले (युयुधयः-न) पापों से युद्ध करनेवाले जैसे (सत्वनम्) तुझ बलवान् (त्रितम्) तीन लोकों में व्याप्त अथवा तीन स्तुति प्रार्थना उपासनाओं से प्राप्त किया जाता है, वैसे तुझ परमात्मा को (आ नशन्त) भलीभाँति प्राप्त करते हैं (इष्टये) अभीष्टसिद्धि के लिये (प्र शिषन्तः) प्रकृष्टरूप से विशेषित करते हैं, प्रशंसित करते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - उपासक जन अजर विभूतिवाले तीनों लोकों में वर्त्तमान तथा जिसकी व्याप्तियाँ सारे संसार में फैली हुईं हैं, उस परमात्मा की अपनी अभीष्टसिद्धि के लिये अनेक प्रकार से स्तुति प्रार्थना उपासना करते हैं ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अपरिभूत वेगवाले' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे अजर जीर्ण न होनेवाले प्रभो ! (यस्य) = जिन (ज्रयसानस्य) = वेगवान् (ते) = आपके (वाता:) = गमन या वायु के समान वेग (धक्षोः न) = अग्नि के समान (अच्युताः) = शत्रुओं से अच्यवनीय होते हुए (परि वि सन्ति) = चारों ओर विद्यमान हैं । [२] उन (सत्वनम्) = बलशाली (त्रितम्) = त्रिलोकी का विस्तार करनेवाले [त्रीन् तनोति] आपके (रण्वासः) = रणप्रिय, युद्ध में गर्जना करनेवाले (युयुधयो न) = योद्धाओं के समान (आनशन्त) = सर्वथा प्राप्त होते हैं। ये (इष्टये) = इष्ट प्राप्ति के लिए व यज्ञादि उत्तम कर्मों के लिए (प्रशिषन्तः) = ये सदा आपका विवेक करनेवाले बनते हैं [to diseriminate from others]। प्रभु का ध्यान करने से चित्तवृत्ति अच्छी बनती है और हमारा झुकाव यज्ञादि उत्तम कर्मों की ओर होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की गति किसी से च्यवनीय नहीं । योद्धा प्रभु को ही पुकारते हैं। प्रभु का विवेक ही हमें यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त करता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अजर) हे जरारहित-अग्रणेतः ! परमात्मन् ! (यस्य ते ज्रयसानस्य धक्षोः) यस्य तव विभुगतिशीलस्य “ज्रयसानौ गच्छन्तौ” [ऋ० ५।६६।५ दयानन्दः] “ज्रयति-गतिकर्मा” [निघ० २।१४] ‘ज्रि धातोः-असानच् प्रत्ययो बाहुलकात्’ पापदाहकस्य (वाताः-न-अच्युताः-वि परि सन्ति) वायव इव व्याप्तिवेगाः-अविनश्वराः विशेषेण सर्वत्र परि प्राप्नुवन्ति (रण्वासः युयुधयः-न) स्तुतिशब्दकर्त्तारः पापैः सह युध्यन्त इव “युध धातोः किन् प्रत्ययो लिट्वच्च छान्दसः’ (सत्वनं त्रितम्-आ नशन्त) त्वां सत्वानं बलवन्तम् ‘सत्वनमिति ह्रस्वत्वं छान्दसम्’ ‘सत्वा बलिष्ठः’ [ऋ० १।१७३।५ दयानन्दः] त्रिषु स्थाने लोकेषु ततं व्याप्तं यद्वा त्रिभिः-स्तुतिप्रार्थनोपासनैस्तन्यते साक्षात् क्रियते तथाभूतं त्वां समन्तात् प्राप्नुवन्ति “आनट्नशत् व्याप्तिकर्मा” [निघ० २।१८] (इष्टये प्र शिषन्तः) अभीष्टसिद्धये प्रकृष्टं विशेषयन्ति प्रशंसन्ति ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, power unaging and dynamic, inviolable and imperishable are your forces like the radiations of dazzling light and blazing fire which, like victorious warriors, come to you, power indomitable and presence pervasive in three worlds, and exhort you for their life’s fulfilment.