पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पितराः) = द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (उदीरय) = उत्कृष्ट गति प्राप्त करा । अर्थात् मस्तिष्क व शरीर दोनों को उन्नत कर । द्युलोक मस्तिष्क है और पृथिवीलोक शरीर । ये दोनों माता व पिता के रूप में वर्णित होते हैं 'पृथिवी माता'। 'माता च पिता च' इस प्रकार विग्रह होने पर, एकशेष होकर, 'पितरौ' यही प्रयोग होता है । [२] (जार:) = [जरतेः स्तुतिकर्मणः] प्रभु का स्तोता (भगं) = भग को (आ इयक्षति) = सब प्रकार से अपने साथ संगत करता है। जीवन के प्रारम्भिक काल में ‘ऐश्वर्यसाधक विज्ञान व धर्म' को वह अपने में दृढ़ करता है, इसके जीवन का मध्य 'यश व श्री' के साथ संगत होता है और जीवन का चरम भाग 'ज्ञान व वैरागमय' होता है। इस प्रकार उस भगवान् के सम्पर्क में आकर यह भी 'भग' वाला बनता है। [३] (हर्यतः) = [हर्य गतिकान्त्योः] उस प्रभु की ओर जानेवाला और उस प्रभु की ही कामना वाला यह (हृत्तः) = हृदय से, हृदयस्थ उस प्रभु से (इष्यति) = प्रेरणा को प्राप्त करता है । [४] (वह्निः) = उस प्रेरणा को धारण करनेवाला यह व्यक्ति उस प्रेरणा को अपने जीवन से कहता है। अर्थात् उस प्रेरणा के अनुसार कार्य करता है। प्रेरणा को कार्य में अनूदित करता है। [५] इस (स्वपस्यते) = उत्तम [सु] कर्मों [अपस्] को अपनाने के लिये इच्छा करते हुए [यं] और इस प्रकार (तविष्यते) = दिव्यगुणों की वृद्धि की इच्छा वाले पुरुष के लिये [तु-वृद्धौ] यह जीवन (मखः) = यज्ञ बन जाता है। इसका जीवन ही यज्ञमय बन जाता है। [६] (असुर:) = [अस्यति] सब अशुभों को अपने से परे फेंकनेवाला यह (मती) = बुद्धि से (वेपते) = दुरितों को कम्पित करके दूर कर देता है। इसका जीवन पवित्र ही पवित्र हो जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मस्तिष्क व शरीर की उन्नति करें। प्रभुस्तवन से भग का अपने जीवन में संगमन करें । हृदयस्थ प्रभु की वाणी को सुनें। उसके अनुसार कार्य करें। हमारा जीवन यज्ञमय हो जाए और हम बुद्धिपूर्वक कार्य करते हुए सब दुरितों को दूर करनेवाले हों ।