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वृषा॒ वृष्णे॑ दुदुहे॒ दोह॑सा दि॒वः पयां॑सि य॒ह्वो अदि॑ते॒रदा॑भ्यः । विश्वं॒ स वे॑द॒ वरु॑णो॒ यथा॑ धि॒या स य॒ज्ञियो॑ यजतु य॒ज्ञियाँ॑ ऋ॒तून् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣā vṛṣṇe duduhe dohasā divaḥ payāṁsi yahvo aditer adābhyaḥ | viśvaṁ sa veda varuṇo yathā dhiyā sa yajñiyo yajatu yajñiyām̐ ṛtūn ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृषा॑ । वृष्णे॑ । दु॒दु॒हे॒ । दोह॑सा । दि॒वः । पयां॑सि । य॒ह्वः । अदि॑तेः । अदा॑भ्यः । विश्व॑म् । सः । वे॒द॒ । वरु॑णः । यथा॑ । धि॒या । सः । य॒ज्ञियः॑ । य॒ज॒तु॒ । य॒ज्ञिया॑न् । ऋ॒तून् ॥ १०.११.१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:11» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:1


ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में अग्नि शब्द से सूर्य परमात्मा गृहीत हैं और प्रधानता से अध्यात्म-राष्ट्र-समृद्धिविषयक प्रकार उपदिष्ट है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यह्वः) महान् (अदाभ्यः) अहिंसनीय (वृषा) सुखवृष्टिकर्ता परमात्मा या सूर्य (वृष्णे) देह में सुखवर्षक मन के लिए, राष्ट्र में सुखवर्षक राजा के लिए, पृथिवी पर जलवर्षक मेघ के लिये (अदितेः-दिवः) अनश्वर मोक्षधाम से, (पयांसि) आनन्दरसों को, जलों, जलांशों-जलकणों को (दोहसा दुदुहे) दोहनसामर्थ्य से दोहता है, (सः) परमात्मा या सूर्य (वरुणः) वरयिता होता हुआ (विश्वं वेद) सब आस्तिकमन, नास्तिकमन, सब न्यायकारी, अन्यायकारी राजा को जनता है; या सब जगत्-पृथिवीप्रदेशों को प्राप्त हुआ (यथा) जैसा ही (सः यज्ञियः) वह सङ्गमनीय (धिया) प्रज्ञा द्वारा या कर्म द्वारा (यज्ञियान्-ऋतून् यजतु) सङ्गमनीय अवसरों पर आस्तिक जनों को सुख के साथ, जड़जङ्गमों को जड़ के साथ सङ्गति करावे-कराता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सुखवृष्टिकर्ता महान् परमात्मा आस्तिक व नास्तिक मनवालों को तथा न्यायकारी या अन्यायकारी राजाओं को जानता है-वह सर्ववेत्ता है। अपने धाम-मोक्षधाम से आनन्दरसों की वृष्टि करता है, अपनी सर्वज्ञता से यथावसर सङ्गमनीय है, वह अपना समागमलाभ देता है। सूर्य महान् पिण्ड सब प्रदेशों पर प्रखरताप से प्राप्त हुआ मेघ में जलांशों को भरता है, वही ऋतुओं का प्रसार करनेवाला है, सङ्गमनीय है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ और वर्षा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि 'आंगि' [अगि गतौ] क्रियाशील व्यक्ति है जो कि (हविर्धान:) = हवि का धारण करनेवाला है, यज्ञ करके यज्ञशेष का ही सेवन करनेवाला है । यह इस बात को समझता है कि (वृषा) = वृष्टि का करनेवाला वह प्रभु (यह्वः) = महान् है [यह इति महतो नामधेयम्] अथवा 'यातश्च हूतश्च' वे प्रभु जाने जाते हैं और पुकारे जाते हैं। अर्थात् जब मनुष्य संसार में अन्य शरण को नहीं देखता, उस समय प्रभु का ही सहारा ढूँढ़ता है और प्रभु की ही ओर जाता है और उसे पुकारता है। वे प्रभु ('अदाभ्यः') = अहिंसित हैं, अपने कार्यों के अन्दर किसी से पराभूत नहीं होते । वे ‘वृषा-यह्व व अदाभ्य' प्रभु (दिवः दोहसा) = द्युलोक के दोहन से (वृष्णे) = औरों पर सुखों की वर्षा करनेवाले, स्वार्थ से ऊपर उठे हुए यज्ञशील पुरुष के लिये (अदितेः) = अखण्डित याग क्रिया से, अर्थात् निरन्तर यज्ञादि के द्वारा (पयांसि) = जलों का (दुदुहे) = दोहन व पूरण करते हैं । द्युलोक रूप गौ को प्रभु दोहते हैं, उस दोहन से वृष्टिजल रूप दूध प्राप्त होता है । [२] वस्तुतः (वरुणः) = हमारे सब कष्टों का निवारण करनेवाले (स) = वे प्रभु (यथा) = क्योंकि (धिया) = ज्ञानपूर्वक कर्मों से (विश्वम्) = सब आवश्यक पदार्थों को वेद प्राप्त कराते हैं । इसलिए (स) = वह (यज्ञियः) = यज्ञशील पुरुष (यज्ञियान् क्रतून्) = यज्ञ करने योग्य ऋतुओं का लक्ष्य करके (यजतु) = यज्ञ करे । प्रभु प्रार्थना को पुरुषार्थ के उपरान्त ही सुनते हैं । अर्थात् प्रार्थना ही करते जाएँ और पुरुषार्थ न करें तो वह प्रार्थना व्यर्थ ही जाती है। सो हम कर्मशील बनें। कर्म भी समझदारी से करने चाहिएँ । 'धिया' शब्द ज्ञान व कर्म का वाचक होकर 'समझदारी से ही कर्मों के करने का संकेत कर रहा है। समझदारी से कर्म करने का अभिप्राय यही है कि ऋतु व समय के अनुसार कर्म किया जाए। [३] सब से बड़ी बुद्धिमत्ता यही है कि मनुष्य अत्यन्त स्वार्थी बनकर अपने मुख में ही आहुति न देता रहे । 'स्वेषु आस्येषु जुह्वत: चेरुः'=अपने ही मुखों में आहुति देनेवाले तो असुर हो जाते हैं। हम असुर न बनकर 'देव' बनें। देव 'वृषा' होते हैं, औरों पर सुखों का वर्षण करनेवाले होते हैं। इस वृषा के लिये प्रभु ही वर्षण करते हैं, और सब अन्नादि ठीक उत्पन्न होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ऋतुओं के अनुसार यज्ञ करनेवाले बनें। यह यज्ञक्रिया 'अदिति' हो, अखण्डित हो। हमारे यज्ञ प्रतिदिन नियमितरूप से चलें ।

ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्तेऽग्निशब्देन सूर्यपरमात्मानौ गृह्येते प्रधानतयाऽध्मात्मराष्ट्र-समृद्धिविषयकप्रकारश्चोपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (यह्वः) महान् “यह्वो महन्नाम” [निघ०१।३] (अदाभ्यः) अहिंसनीयः (वृषा) सुखवृष्टिकर्त्ता परमात्मा सूर्यो वा (वृष्णे) राष्ट्रे सुखवर्षकाय राजन्याय-राज्ञे “वृषा वै राजन्यः” [ता०६।१०।९] देहे सुखवर्षकाय मनसे “वृषा हि मनः” [श०१।४।४।३] वृष्टिकर्त्रे पर्जन्याय मेघाय वा “वृषा पर्जन्यः” [तै०सं०२।४।९।४] (अदितेः-दिवः) अनश्वरान्मोक्षादमृतधामतः “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ०१०।९०।३] द्युलोकादाकाशाद्वा (पयांसि) आनन्दरसान्, जलानि जलांशान् वा (दोहसा दुदुहे) दोहनसामर्थ्येन दोग्धि प्रपूरयति (सः) परमात्मा सूर्यो वा (वरुणः) वरयिता सन् (विश्वं वेद) सर्वं ह्यास्तिकमनो नास्तिकमनो वेत्ति सर्वं जगत्-पृथिवीप्रदेशान् लभते (यथा) यथा खलु (सः-यज्ञियः) स सङ्गमनधर्मा (धिया) प्रज्ञया कर्मणा वा (यज्ञियान्-ऋतून् यजतु) सङ्गमनीयानृतून्-अवसरान् “अत्यन्तसंयोगे द्वितीया” [अष्टा०२।३।५] उपासकान् सुखेन सह, जडजङ्गमान् जडेन सह वा सङ्गमयतु ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Generous, omnipotent and indomitable Agni, self-refulgent ruling Spirit of life in the systemic order of existence, with its natural art and intelligence and creativity, creates and showers the waters of growth and sustenance from the divine infinity of inexhaustible plenty of light, life and joy for the yajnic and generous powers of nature and humanity. The Spirit is Varuna, omniscient intelligence with universal discrimination, knowing the world as it is and the way it behaves. May the lovable and adorable Agni worshipped at yajna love, join and bless the yajnic celebrants of life divine according to the seasons and its own love and judgement.