पदार्थान्वयभाषाः - [१] (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष, गृहस्थ की समाप्ति पर (वै) = निश्चय से (पुनः) = फिर (अददुः) = इस ब्रह्मजाया को औरों के लिए देनेवाले होते हैं । इस प्रकार वानप्रस्थ अपने पाठनरूप नियत कर्म को करता है । (उत) = और (मनुष्याः) = ये विचारशील पुरुष (पुनः) = फिर इस वेदवाणी को देते हैं। 'मत्वाकर्माणि सीव्यति' विचार करके ही कर्मों को करनेवाले ये लोग गृहस्थ से ऊपर उठते हैं और वनस्थ होकर स्वयं स्वाध्याय करते हुए औरों को ज्ञान देते हैं। [२] (राजानः) = बड़े व्यवस्थित [ = regulated] जीवनवाले ये लोग (सत्यम्) = सत्य को (कृण्वानाः) = करते हुए, अर्थात् अपने जीवनों में सत्याचरणवाले होते हुए और सत्य प्रभु को प्रकट करते हुए (ब्रह्मजायाम्) = इस वेदवाणी को (पुनः ददुः) = फिर से औरों के लिए देने लगते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वानप्रस्थ का मुख्य कार्य इस ज्ञान को औरों के लिए देना है। इस कार्य के लिए इन्हें 'देव, मनुष्य व राजा' बनना है। देववृत्ति का बनकर ये अपने को ज्ञान ज्योति से दीप्त करते हैं। मनुष्य बनकर विचारपूर्वक कर्म करते हैं और राजा बनकर ये अपने जीवन को बड़ा नियन्त्रित करनेवाले होते हैं।