देवों तथा ऋषियों के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पूर्वे देवा:) = सृष्टि के प्रारम्भ में होनेवाले 'पूर्वे चत्वारः' अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा नामक देव तथा (सप्त ऋषयः) = सात ऋषि [महर्षयः सप्त ] (एतस्याम्) = इस ब्रह्मजाया के विषय में, वेदवाणी के विषय में (अवदन्त) = परस्पर वार्ता करते हैं, आपस में मिलकर ज्ञान की ही चर्चा करते हैं। वे ऋषि (ये) = जो (तपसे) = तप के लिए (निषेदुः) = निश्चय से आसीन होते हैं, अर्थात् जो अपना जीवन तपस्यामय बिताते हैं । तपस्या के बिना ज्ञान प्राप्ति का सम्भव ही नहीं। [२] (ब्राह्मणस्य) = उस ज्ञान पुञ्ज प्रभु की (जाया) = यह वेदवाणीरूप पत्नी उपनीता समीप प्राप्त करायी जाने पर (भीमा) = शत्रुओं के लिए भयंकर होती है। जब हम इसकी आराधना के द्वारा हृदय को प्रकाशमय करते हैं तो यह काम-क्रोधादि शत्रुओं का विध्वंस करनेवाली होती है। उसके शत्रुओं के लिए यह भयंकर होती है जो (दुर्धाम्) = कठिनता से, तीव्र तप के द्वारा धारण करने योग्य इसको परमे (व्योमन्) = उत्कृष्ट हृदयाकाश में दधाति धारण करता है। हम हृदयों में इसे धारित करते हैं तो यह हमारे शत्रुओं का विध्वंस कर देती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ–देव तथा ऋषि तपस्या के द्वारा वेदवाणी को प्राप्त करते हैं। यह उनके शत्रुओं का विध्वंस करती है। वस्तुतः इसके धारण से ही देवत्व व ऋषित्व प्राप्त होता है ।