पदार्थान्वयभाषाः - [१] जिस समय लोग परमात्मा-सी दी गई इस वेदवाणी को (इयं ब्रह्मजाया) = 'यह ब्रह्म का प्रादुर्भाव व प्रकाश करनेवाली है' (इति) = इस प्रकार (चेत्) = यदि (अवोचन्) = उच्चारित करते हैं तो (अस्या:) = इस ब्रह्मजाया के (हस्तेन) = हाथ से, आश्रय से ही (आधि:) = सब दुःख [bane, eurse, misery] (ग्राह्य:) = वश में करने योग्य होता है । हमने इस ब्रह्मजाया का हाथ पकड़ा और हमारे सब कष्ट दूर हुए। [२] (एषा) = यह ब्रह्मजाया (प्रह्यो) = [प्रहिताया] भेजे हुए (दूताय) = दूत के लिए (न तस्थे) = स्थित नहीं होती । अर्थात् इसे स्वयं न पढ़कर किसी और से इसका पाठ कराते रहने से ही पुण्य नहीं प्राप्त हो जाता । (क्षत्रियस्य) = एक क्षत्रिय का (राष्ट्रम्) = राष्ट्र भी तो तथा उसी प्रकार (गुपितम्) = रक्षित होता है। राष्ट्र की रक्षा भी राजा स्वयं सावधान व जागरित होकर ही कर पाता है दूसरों को शासन सौंपकर भोग-विलास में पड़े रहनेवाला राजा कभी राष्ट्र को रक्षित नहीं कर पाता। इसी प्रकार वेदवाणी को स्वयं पढ़नेवाला ही वेद से लाभान्वित होता है। स्वयं अध्ययन ही जीवन को उन्नत करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्वाध्याय मनुष्य ने स्वयं करना है। यह स्वाध्याय उसके सब कष्टों को दूर करेगा ।