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भो॒जा जि॑ग्युः सुर॒भिं योनि॒मग्रे॑ भो॒जा जि॑ग्युर्व॒ध्वं१॒॑ या सु॒वासा॑: । भो॒जा जि॑ग्युरन्त॒:पेयं॒ सुरा॑या भो॒जा जि॑ग्यु॒र्ये अहू॑ताः प्र॒यन्ति॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bhojā jigyuḥ surabhiṁ yonim agre bhojā jigyur vadhvaṁ yā suvāsāḥ | bhojā jigyur antaḥpeyaṁ surāyā bhojā jigyur ye ahūtāḥ prayanti ||

पद पाठ

भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । सु॒र॒भिम् । योनि॑म् । अग्रे॑ । भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । व॒ध्व॑म् । या । सु॒ऽवासाः॑ । भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । अ॒न्तः॒ऽपेय॑म् । सुरा॑याः । भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । ये । अहू॑ताः । प्र॒ऽयन्ति॑ ॥ १०.१०७.९

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:107» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:9


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भोजाः) दक्षिणादान से अन्यों का पालन करनेवाले (अग्रे) सर्वप्रथम (सुरभिं योनिम्) सुगन्धयुक्त घर को (जिग्युः) प्राप्त करते हैं (भोजाः) पालन करनेवाले (जिग्युः) प्राप्त करते हैं (वध्वम्) वधू को (या सुवासाः) जो सुन्दर वस्त्रादियुक्त हो (भोजाः) पालक जन (सुरायाः-अन्तः पेयम्) शोभन [भोग] प्रद स्त्री का अथवा जन का अन्तःपान स्त्री के साथ एकान्तपान को (जिग्युः) प्राप्त करते हैं (भोजाः) पालकजन (अहूताः-ये प्र यन्ति) बिना बुलाए जो प्राप्त होते हैं, उन्हें (जिग्युः) स्वाधीन करते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - अन्यों का दक्षिणा से पालन करनेवाले जन अच्छे सुरम्य सुगन्धयुक्त सदन को प्राप्त होते हैं, सुन्दर वस्त्रादियुक्त वधू को विवाहते हैं। पत्नी के अन्तर्भाव का या एकान्त समागम का आनन्द प्राप्त करते हैं, बिना बुलाये हुओं का हृदय जीतते हैं ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दान से गृह का सौन्दर्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्रे) = सब से आगे तो (भोजाः) = दानवृत्ति से औरों का पालन करनेवाले पुरुष (सुरक्षिं योनिम्) = बड़े सुगन्धिवाले घर को (जिग्युः) = जीतते हैं [सुरभि = shining, good, gistuous, wise] ये ऐसे घर को प्राप्त करते हैं जिसमें कि सब लोग स्वास्थ्य की दीप्तिवाले, उत्तम वृत्तिवाले व बुद्धिमान् होते हैं। [२] (भोजाः) = ये औरों का पालन करनेवाले पुरुष उस (वध्वं जिग्युः) = वधू को प्राप्त करते हैं (या) = जो (सुवासाः) = जो आर्यवेश [सु+वासस्] वाली होती हुई घर में सब के उत्तम निवास का कारण बनती है [सुष्ठु वासयति । [३] (भोजाः) = ये भोज पुरुष (सुरायाः) = ऐश्वर्य के (अन्तः पेयम्) = घर के अन्दर पान को (जिग्यु:) = जीतते हैं। इनके घर में ऐश्वर्य की कमी नहीं होती । परन्तु इस ऐश्वर्य को यह अन्तः पेय बनाते हैं, क्लव आदि में उसका अपव्यय नहीं करते। [४] और अन्त में (भोजाः) = ये पुरुष उनको (जिग्युः) = जीत लेते हैं, युद्ध में पराजित करनेवाले होते हैं (ये) = जो (अहूताः) = बिना युद्ध के लिए ललकारे गये हुए भी (प्रयन्ति) = धावा बोल देते हैं । अर्थात् आक्रमणात्मक युद्ध करनेवालों के ये पराजित करनेवाले होते हैं। जिस देश के व्यक्तियों में यह त्यागवृत्ति होगी वह देश कभी शत्रुओं का शिकार नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दान से घर अच्छा बनता है, देश स्वतन्त्र रहता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भोजाः-अग्रे सुरभिं योनिं जिग्युः) भोजयितारः सर्वद्रक्ष्यं सुगन्धियुक्तं गृहं सदनं जयन्ति प्राप्नुवन्ति (भोजाः जिग्युः-वध्वं या सुवासाः) भोजयितारः वधूं प्राप्नुवन्ति या सुन्दरवस्त्रादियुक्ता (भोजाः-सुरायाः-अन्तः पेयम्) भोजयितारः शोभनं भोगप्रदाया स्त्रियः “सुरमा शोभनदानशीलया स्त्रिया” [यजु० १९।३३ दयानन्दः] यद्वा जलस्य “सुरा-उदकनाम” [निघ० १।१२] अन्तःपानस्त्रिया सहैकान्तपानं (जिग्युः) प्राप्नुवन्ति (भोजाः-अहूताः-ये प्रयन्ति) भोजयितारस्तानपि जयन्ति स्वाधीनं नयन्ति ये-अनाहूताः प्राप्नुवन्ति तान् (जिग्युः) स्ववशं कुर्वन्ति ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The givers of food and relief first get a good fragrant home, liberal givers win a fair accomplished wife, generous givers reach the end sweetness of all drinks, and they win over even those who assail them, without challenge or provocation.