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दक्षि॒णाश्वं॒ दक्षि॑णा॒ गां द॑दाति॒ दक्षि॑णा च॒न्द्रमु॒त यद्धिर॑ण्यम् । दक्षि॒णान्नं॑ वनुते॒ यो न॑ आ॒त्मा दक्षि॑णां॒ वर्म॑ कृणुते विजा॒नन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dakṣiṇāśvaṁ dakṣiṇā gāṁ dadāti dakṣiṇā candram uta yad dhiraṇyam | dakṣiṇānnaṁ vanute yo na ātmā dakṣiṇāṁ varma kṛṇute vijānan ||

पद पाठ

दक्षि॑णा । अश्व॑म् । दक्षि॑णा । गाम् । द॒दा॒ति॒ । दक्षि॑णा । च॒न्द्रम् । उ॒त । यत् । हिर॑ण्यम् । दक्षि॑णा । अन्न॑म् । व॒नु॒ते॒ । यः । नः॒ । आ॒त्मा । दक्षि॑णाम् । वर्म॑ । कृ॒णु॒ते॒ । वि॒ऽजा॒नन् ॥ १०.१०७.७

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:107» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जो जन (दक्षिणा) दक्षिणा में (अश्वम्) घोड़े को (दक्षिणा) दक्षिणा में (गाम्) गौ को (ददाति) देता है (दक्षिणा) दक्षिणा में (चन्द्रम्) आह्लादक चाँदी आदि श्वेत धातु (उत यत्) अथवा (हिरण्यम्) मनोहारी हितरमणीय स्वर्ण को (दक्षिणा) दक्षिणा में (अन्नं) अन्न को (वनुते) देता है (नः-आत्मा) वह दाता हमारा आत्मा है निज है-अपना है (विजानन्) विशेषरूप से जानता हुआ (दक्षिणां कवचं कृणुते) दक्षिणा को स्वकीय कवच-प्रहार का निवारक साधन करता है, बनाता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - दक्षिणा में घोड़ा, गौ, चाँदी, सोना अन्न देना श्रेयस्कर है, इस प्रकार दक्षिणा देनेवाला अन्य जनों का आत्मा बन जाता है, उसे कोई पीड़ा नहीं पहुँचाता है तथा उसको दक्षिणा देना उसके लिए पापनिवारक कवच बन जाता है ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दक्षिणा से अभ्युदय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दक्षिणा) = दान की वृत्ति हमारे लिए (अश्वं ददाति) = घोड़ों को देती हैं। (दक्षिणा) = यह दान की वृत्ति (गां ददाति) = गौवों को देती है । (दक्षिणा) = यह दान हमें (चन्द्रम्) = चाँदी को देता है, (उत) = और (यत् हिरण्यम्) = जो स्वर्ण है अथवा (हित) = रमणीय है उस सबको देता है । [२] (दक्षिणा) = दान (अन्नं वनुते) = हमारे लिए अन्न का विजय करता है । इसलिए (यः) = जो (नः) = हम सबका (आत्मा) = आत्मा है, अर्थात् 'सर्वभूतान्तरात्मा' प्रभु है वह (विजानन्) = विशिष्ट ज्ञानवाला होता हुआ (दक्षिणाम्) = इस दानवृत्ति को (वर्म कृणुते) = हमारे लिए कवच के रूप में करता है। इस कवच से रक्षित हुए हुए हम वासना के तीरों से घायल नहीं होते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दान अभ्युदय का कारण है और हमारे लिए कवच का काम देता है, यह हमें वासनाशरों से विद्ध नहीं होने देता।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) यो जनः (दक्षिणा) दक्षिणायाम् “सुपां सुलुक्” [अष्टा० ७।१।३९] इति विभक्तेर्लुक् (अश्वम्) तुरङ्गं (दक्षिणा) दक्षिणायां (गाम्) धेनुं (ददाति) प्रयच्छति (दक्षिणा) दक्षिणायाम् (चन्द्रम्) आह्लादकं वस्तु रजतादिकं श्वेतवर्णं धातुं (उत-यत्) यद्वा (हिरण्यम्) मनोहारिणं हितरमणीयं सुवर्णं (दक्षिणा) दक्षिणायाम् (अन्नं वनुते) अन्नं प्रयच्छति “वनुष्व प्रयच्छ” [ऋ० १।१६९।१ दयानन्दः] (नः आत्मा) स दाताऽस्माकमात्मा निज एव (विजानन्) विशेषेण जानन् सन् (दक्षिणां कवचं कृणुते) दक्षिणां स्वकीयं कवचं प्रहारनिवारकं साधनं करोति ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He who gives a horse as dakshina, who gives a cow, who gives silver, who gives gold, gives food and food grains, that giver is our own, the very soul of yajna and, knowing this secret of yajna, he creates a protective cover for himself by dakshina.