पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नृचक्षसः) = [चक्ष् to look after ] मनुष्यों का पालन करनेवाले (ते) = वे विद्वान् (हविः) = दानपूर्वक अदन को [ हु दानादनयोः हविः] त्याग करके यज्ञशेष के सेवन की वृत्ति को (शतधारम्) = सैंकड़ों का धारण करनेवाली (वायुम्) = वायु की तरह प्राणशक्ति को देनेवाली (अर्कम्) = उपासना की साधनभूत (स्वर्विदम्) = प्रकाश व स्वर्ग को प्राप्त करानेवाली (अभिचक्षते) = कहते हैं । त्यागपूर्वक अदन की वृत्ति से हम अपना ही पेट न भरते हुए सैंकड़ों का धारण करते हैं, यह त्यागपूर्वक अदन हमारे लिए वायु की तरह जीवनप्रद होता है, इससे हम प्रभु का आराधन करते हैं और यह हमें स्वर्ग को प्राप्त करानेवाला है । [२] (ये) = जो भी व्यक्ति (पृणन्ति) = इस प्रकार दानवृत्ति से प्रभु को प्रीणित करते हैं, (च) = और (संगमे) = सबके एकत्रित होने के स्थानभूत यज्ञों में (प्रयच्छन्ति) = खूब दान देते हैं, (ते) = वे (दक्षिणाम्) = इस दान को (सप्तमातरम्) = सात से मापकर, अर्थात् सप्तगुणित रूप में (दुहते) = अपने में पूरित करते हैं। जितना देते हैं, वह सप्तगुणित होकर उन्हें प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार दान से धन बढ़ता ही है, कम नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दान ' शतधार, वायु, अर्क व स्वर्विद्' है ।