पदार्थान्वयभाषाः - [१] (भोजम्) = दान द्वारा औरों का पालन करनेवाले को (सुष्ठुवाहः) = उत्तमता से वहन करनेवाले (अश्वाः) = घोड़े (वहन्ति) = वहन करते हैं। (दक्षिणायाः) = दान का (रथः) = रथ (सुवृत् वर्तते) = [सुष्ठु चक्रादि वर्तनं यस्य] उत्तम चक्र आदि से युक्त होता है। अर्थात् दानी पुरुष का उत्तम रथ, उत्तम घोड़ों से जुता हुआ होता है । [२] (देवासः) = हे देवो! आप (भोजम्) = इस दानशील पुरुष को (भरेषु) = संग्रामों में (अवता) = रक्षित करते हो, आप से रक्षित हुआ हुआ यह (भोजः) = दानशील पुरुष (समनीकेषु) = संग्रामों में (शत्रून् जेता) = शत्रुओं को जीतनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दानशील पुरुष को सम्पत्ति व विजय प्राप्त होती है । यह सूक्त दानकी महिमा को बहुत अच्छी प्रकार प्रतिपादित कर रहा है। दान से ऐश्वर्य बढ़ता है, विजय प्राप्त होती है, वासनाओं का विनाश होकर प्रभु की प्राप्ति होती है। धन का लोभ हो जाने पर इस दानवृत्ति में कमी आ जाती है। मनुष्य 'पणि'-सा बन जाता है, पणियाँ। 'पण व्यवहारे' से बना यह पणि शब्द कह रहा है कि यह शुद्ध व्यवहारी पुरुष बन जाता है, अपने प्राणपोषण में ही फँसा हुआ यह 'असुर' कहलाता है [असुषु रमते] । इन्हें देवशुनी - देवताओं में वृद्धि को प्राप्त होनेवाली [श्वि - वृद्धौ ] सरमा गतिशील बुद्धि दान आदि के लिए प्रेरित करती है । अगले सूक्त में इन पणियों व सरमा का ही संवाद है-