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आ॒विर॑भू॒न्महि॒ माघो॑नमेषां॒ विश्वं॑ जी॒वं तम॑सो॒ निर॑मोचि । महि॒ ज्योति॑: पि॒तृभि॑र्द॒त्तमागा॑दु॒रुः पन्था॒ दक्षि॑णाया अदर्शि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āvir abhūn mahi māghonam eṣāṁ viśvaṁ jīvaṁ tamaso nir amoci | mahi jyotiḥ pitṛbhir dattam āgād uruḥ panthā dakṣiṇāyā adarśi ||

पद पाठ

आ॒विः । अ॒भू॒त् । महि॑ । माघो॑नम् । ए॒षा॒म् । विश्व॑म् । जी॒वम् । तम॑सः । निः । अ॒मो॒चि॒ । महि॑ । ज्योतिः॑ । पि॒तृऽभिः॑ । द॒त्तम् । आ । अ॒गा॒त् । उ॒रुः । पन्थाः॑ । दक्षि॑णायाः । अ॒द॒र्शि॒ ॥ १०.१०७.१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:107» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:3» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:1


ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में विविध दक्षिणा यज्ञादि शुभकर्मों में देनी चाहिये, संसार में यशस्करी अध्यात्म शान्तिप्रद है, पर दक्षिणादाता परमात्मा के प्रिय बनते हैं, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) इन रश्मियों का तथा राजसभासदों का (माघोनम्) सूर्यसम्बन्धी तथा राजसम्बन्धी (महि) ज्योति या महत्त्व (आविः-अभूत्) प्रगट होता है-सम्पन्न होता है (विश्वं-जीवम्) सब जीवनवाली वस्तु (तमसः) अन्धकार से (निर्-अमोचि) निर्मुक्त हो जाती है छूट जाती है (महि ज्योतिः) वह महा ज्योति (पितृभिः) रश्मियों द्वारा तथा पालक राजसभासदों द्वारा (दत्तम्) दिया हुआ प्रकाश पद या राजपद (आगात्) आता है या प्राप्त होता है (दक्षिणायाः) दक्षिणा देने का (उरुः-पन्था) महान् मार्ग (अदर्शि) दृष्ट होता है-दिखाया जाता है। सूर्योदय के अनन्तर यज्ञ किया जाता है और दक्षिणा दी जाती है, राजा द्वारा राजसूययज्ञ में दक्षिणा विविध अधिकार में दी जाती है, इस प्रकार दान का मार्ग दृष्ट होता है-दिखाया जाता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सूर्य जब उदय होता है, रश्मियों का प्रकाश प्रकट होता है, अन्धकार से प्रत्येक वस्तु निर्मुक्त हो जाती है, सूर्योदय के अनन्तर ही यज्ञ किया जाता है और दक्षिणा दी जाती है एवं राजा जब राजसूययज्ञ करके राजारूप में प्रसिद्ध होता है, तो सभासदों द्वारा राजपद घोषित किया जाता है, प्रजाजन अन्याय अन्धकार से मुक्त हो जाता है और राजसूययज्ञ में पुरोहितों तथा अधिकारियों को दक्षिणा तथा अधिकार दक्षिणा दी जाती है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महान् ऐश्वर्य का आविर्भाव [दक्षिणा का विशाल मार्ग]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दक्षिणाया:) = दक्षिणा का, दानवृत्ति का (उरुः पन्थाः) = विशाल मार्ग अदर्शि देखा जाता है। दान का मार्ग मनुष्य का कल्याण ही कल्याण करनेवाला है। सब से प्रथम तो (एषाम्) = इन दान की वृत्तिवाले पुरुषों का (महि) = महनीय (माघोनम्) = ऐश्वर्य (अविः अभूत्) = प्रकट होता है। दान से कभी ऐश्वर्य घटता नहीं, बढ़ता ही है । [२] दक्षिणा का दूसरा लाभ यह है कि (विश्वं जीवम्) = सब जीव, घर में प्रवेश करनेवाले सब प्राणी (तमसः) = अज्ञानान्धकार से (निरमोचि) = मुक्त हो जाते हैं । जहाँ दान की परिपाटी होती है, वहाँ लोभ की वृत्ति के न होने से दिमाग सुलझा हुआ रहता है। दान से मनोवृत्ति तामसी नहीं रहती । [३] इस दक्षिणा के मार्ग पर चलने से (पितृभिः) = माता, पिता, आचार्य आदि से (दत्तम्) = दी हुई (महि ज्योतिः) = महनीय ज्ञान की ज्योति आगात् प्राप्त होती है । अर्थ में न फँसे हुओं को ही ज्ञान प्राप्त होता है । अर्थासक्त पुरुष प्रकाश को नहीं देख पाता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दान का मार्ग विशाल है। इस मार्ग पर चलनेवालों को ऐश्वर्य भी प्राप्त होता है और ज्ञान भी ।

ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते विविधदक्षिणा यज्ञादिशुभकर्मसु दातव्या संसारे यशस्करी तथाऽध्यात्मशान्तिप्रदातास्ति दक्षिणादातारः परमात्मनः प्रिया भवन्तीत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषां माघोनं महि-आविः-अभूत्) एतेषां रश्मीनां राजसभासदां वा यत् खलु माघोनमैन्द्रम्, “इन्द्रो मघवान्” [श० ४।१।२।१५] इन्द्रश्च सूर्यो राजा वा-“असौ आदित्य इन्द्रः” [मै० ४।७।३] “तस्येदम्” [अष्टा० ४।३।१२०] इत्यत्र-अण् माघोनं वकारस्य सम्प्रसारणम् ‘तद्धितेऽपि छान्दसं सम्प्रसारणम्’ महज्ज्योतिर्महत्त्वं वा प्रादुर्भवति सम्पद्यते वा “यज्ञेन मघवान्” [काठ० ३९।१३] राजसूययज्ञेन राजा मघवान् भवति, तदा (विश्वं जीवं तमसः-निर्-अमोचि) सर्वं जीवं जीवनवत् वस्तु खल्वन्धकारान्निर्मुक्तं भवति (महि ज्योतिः) तन्महज्ज्योतिः (पितृभिः-दत्तम्-आगात्) पालकरश्मिभिर्दत्तं पालकराजसभासद्भिर्दत्तं राजपदं दत्तमागच्छति प्राप्नोति (दक्षिणायाः-उरुः पन्था-अदर्शि) दक्षिणायाः खलु महान्-मार्गः दृष्टो भवति सूर्योदयानन्तरं यज्ञोऽनुष्ठीयते तत्र दक्षिणा दीयते “अयज्ञो वा एष यददक्षिणः” राज्ञा राजसूये दक्षिणा विविधाधिकाररूपा दीयते दानस्य मार्गो दृष्टो भवति ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Revealed and manifest is the great light and glory of these sun-rays, the entire life of the world is revealed and released from darkness. Mighty light given by parental radiations of the sun is come, yajna is accomplished, and the broad flow of generosity is seen on high.