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प्रोग्रां पी॒तिं वृष्ण॑ इयर्मि स॒त्यां प्र॒यै सु॒तस्य॑ हर्यश्व॒ तुभ्य॑म् । इन्द्र॒ धेना॑भिरि॒ह मा॑दयस्व धी॒भिर्विश्वा॑भि॒: शच्या॑ गृणा॒नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

progrām pītiṁ vṛṣṇa iyarmi satyām prayai sutasya haryaśva tubhyam | indra dhenābhir iha mādayasva dhībhir viśvābhiḥ śacyā gṛṇānaḥ ||

पद पाठ

प्र । उ॒ग्राम् । पी॒तिम् । वृष्णे॑ । इ॒य॒र्मि॒ । स॒त्याम् । प्र॒ऽयै । सु॒तस्य॑ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । तुभ्य॑म् । इन्द्र॑ । धेना॑भिः । इ॒ह । मा॒द॒य॒स्व॒ । धी॒भिः । विश्वा॑भिः । शच्या॑ । गृ॒णा॒नः ॥ १०.१०४.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:104» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (हर्यश्व) हे सर्वपदार्थहारक व्यापनगुणवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! (तुभ्यं वृष्णे) तुझ सुखवर्षक के लिये (उग्रां सत्याम्) तीव्र सद्भाववाली (पीतिं प्र-इयर्मि) उपासनारसरूप पानधारा को प्रेरित करता हूँ-समर्पित करता हूँ (सुतस्य प्रयै) निष्पादित के प्राप्त करने के लिये (विश्वाभिः-धेनाभिः) सब स्तुतिवाणियों (धीभिः शच्या) कर्मों तथा बुद्धि  के द्वारा (गृणानः) स्तुति किया जाता हुआ (इह) इस अध्यात्मयज्ञ में (मादयस्व) मुझे हर्षित कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - सब पदार्थों को अपने में रखने के गुणवाला परमात्मा सुखवर्षक है, उसकी तीव्र भावना से सच्ची स्तुति करनी चाहिये, इस प्रकार स्तुति में लाया हुआ परमात्मा उपासक को हर्षित करता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उदात्त सत्य जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (हर्यश्व) = [हरि = ray of light] प्रकाशमय इन्द्रियरूप अश्वोंवाले प्रभो ! [ प्रकाशमय इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले] (वृष्णे) = सब सुखों के वर्षक (तुभ्यम्) = आपके प्रति (प्रयै) = प्रगमन के लिए (सुतस्य) = इस उत्पन्न हुए हुए सोम की (उग्राम्) = हमारे जीवनों को उदात्त बनानेवाली तथा (सत्याम्) = हमारे जीवनों को सत्यमय बनानेवाली (पीतिम्) = पीति को, पान को (प्र इयर्मि) = प्रकर्षेण प्राप्त होता हूँ। मैं सोम का पान करता हूँ। यह सोमपान मुझे उदात्त व सत्य जीवनवाला बनाता है और अन्ततः प्रभु की प्राप्ति का साधन बनता है । [२] हे (इन्द्र) = ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाले प्रभो ! (धेनाभिः) = ज्ञान की वाणियों से (इह) = इस जीवन में (मादयस्व) = हमें आनन्दित करिये। [३] आप (विश्वाभिः धीभिः) = सम्पूर्ण प्रज्ञानों से तथा शच्या शक्ति से (गृणानः) = स्तूपमान हैं। सम्पूर्ण प्रज्ञान व शक्ति आपकी ही है। आपके तेज के अंश से ही जहाँ तहाँ प्रज्ञान व शक्ति का दर्शन होता है । बुद्धिमानों की बुद्धि आप हैं और बलवानों के बल भी आप ही हैं। आपने ही हमें ज्ञान व शक्ति प्राप्त करानी है। इस ज्ञान व शक्ति की प्राप्ति का द्वार यह सोमपान होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं सोमपान द्वारा अपने जीवन को उदात्त व सत्य बनाऊँ । प्रभु की उपासना से ज्ञान व शक्ति को प्राप्त करूँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (हर्यश्व इन्द्र) सर्वपदार्थहारि व्यापनगुणवन् ! “हरणशीला व्यापनस्वभावा यस्य तत्सम्बुद्धौ” [ऋ० ३।३२।५ दयानन्दः] परमात्मन् ! (तुभ्यं वृष्णे) तुभ्यं सुखवर्षकाय (उग्रां सत्यां पीतिं प्र-इयर्मि) तीव्रां सद्भाववतीमुपासनारसरूपां पानधारां प्रेरयामि समर्पयामि (सुतस्य प्रयै) निष्पादितस्य प्रापणाय (विश्वाभिः-धेनाभिः) सर्वाभिः स्तुतिर्वाग्भिः “धेना वाङ्नाम” [निघ० १।११] (धीभिः शच्या गृणानः) कर्मभिः प्रज्ञया च “शची प्रज्ञानाम” [निघ० ३।९] स्तूयमानः “कर्मणि कर्तृप्रत्ययः” (इह मादयस्व) अस्मिनध्यात्मयज्ञे मां हर्षय ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of showers and nature’s radiant rays, I move this prayer and offer this soma drink distilled so true and exalting for your pleasure. Indra, adored and exalted by all our songs, thoughts and holy actions here, pray rejoice and exalt us too.