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इन्द्र॑ आसां ने॒ता बृह॒स्पति॒र्दक्षि॑णा य॒ज्ञः पु॒र ए॑तु॒ सोम॑: । दे॒व॒से॒नाना॑मभिभञ्जती॒नां जय॑न्तीनां म॒रुतो॑ य॒न्त्वग्र॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indra āsāṁ netā bṛhaspatir dakṣiṇā yajñaḥ pura etu somaḥ | devasenānām abhibhañjatīnāṁ jayantīnām maruto yantv agram ||

पद पाठ

इन्द्रः॑ । आ॒सा॒म् । ने॒ता । बृह॒स्पतिः॑ । दक्षि॑णा । य॒ज्ञः । पु॒रः । ए॒तु॒ । सोमः॑ । दे॒व॒ऽसे॒नाना॑म् । अ॒भि॒ऽभ॒ञ्ज॒ती॒नाम् । जय॑न्तीनाम् । म॒रुतः॑ । य॒न्तु॒ । अग्र॑म् ॥ १०.१०३.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:103» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:23» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आसाम्) इन (देवसेनानाम्) विजय चाहनेवाली सेनाओं (अभिभञ्जतीनाम्) शत्रुओं का भञ्जन करती हुई (जयन्तीनाम्) जय प्राप्त करती हुई का (नेता) नायक, विद्युत्शक्तिसम्पन्न वीर राजा (बृहस्पतिः) विद्वान् सेनापति (दक्षिणा यज्ञः) दक्षिण भाग में यज्ञ-जिसके है, ऐसा यज्ञपरायण परोपकारी (सोमः) शान्तस्वभाव सेनाप्रेरक के अधीन (मरुतः) सैनिक जन (अग्रम्) आगे (यन्तु) जाते हैं, बढ़ते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - जिस राष्ट्र में विजय चाहनेवाली, शत्रु का विभञ्जन करनेवाली, जय प्राप्त करने की शक्तिवाली सेनाएँ हों और उसका नेता शासक या सेनापति विद्युत्शक्ति जैसा वीर विद्वान् परोपकारी शान्तस्वभाव हो, तो सैनिक जन युद्ध में आगे बढ़ते चले जाते हैं और अन्त में युद्ध में विजय पाते हैं ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवसेनाएँ और उनका सेनापति

पदार्थान्वयभाषाः - (देवसेनाएँ) - दिव्य और आसुर गुणों को वेद में 'देवसेना' व 'असुरसेना' कहा गया है। ये देवसेनाएँ प्रबल होकर असुरों का पराजय करती हैं। क्रोध पर दया विजय पाती है, लोभ पर सन्तोष व दान, और काम प्रेम के रूप में परिवर्तित हो जाता है। (देवसेनानाम्) = इन देवसेनाओं के, (अभिभञ्जतीनाम्) = जो चारों ओर आसुर भावनाओं का विदारण व भङ्ग कर रही हैं और (जयन्तीनाम्) = आसुरी वृत्तियों पर विजय पाती चलती हैं, (अग्रम्) = आगे (मरुतः यन्तु) = मरुत्-प्राणों की साधना करनेवाले मनुष्य चलें, अर्थात् ये देवसेनाएँ प्राण-साधना करनेवालों के पीछे चला करती हैं । प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष क्षीण होते हैं, मन का मैल नष्ट होता है और गन्दगी में उत्पन्न होनेवाले मच्छरों की भाँति अपवित्रता से जन्म लेनेवाली आसुर वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। एवं, स्पष्ट है कि मरुतों की प्राण-साधना देव सेनाओं के विजय के लिए आवश्यक है । (आसाम्) = इन विजयशील देव-सेनाओं का (नेता) = सेनापति (इन्द्रः) = इन्द्र है । इन्द्र है 'इन्द्रियों का अधिष्ठाता', जो इन्द्रियों का दास न होकर 'हृषीकेश' है । (हृषीक) = इन्द्रिय, (ईश) = स्वामी । देवराट् यह इन्द्र ही है। यदि जीभ ने चाहा और हमने खाया, आँख ने चाहा है और हमने देखा, कान ने चाहा और हमने सुना तब तो हम इन इन्द्रियों के दास बन जाएँगे, हम इन्द्र न रहेंगे। (देवसेना के प्रमुख व्यक्ति)—इस देव सेना के (पुरः) = प्रथम स्थान में - अग्रस्थान में (एतु) = चलें । कौन ? १. (बृहस्पतिः) = ब्रह्मणस्पति - ज्ञान का स्वामी, देवताओं का गुरु, ज्ञानियों का भी ज्ञानी । दिव्य गुणों में ज्ञान का सर्वोच्च स्थान है । वास्तविकता तो यह है कि ज्ञान के अभाव में ही तो कामादि वासनाएँ पनपती हैं। ज्ञानाग्नि इन्हें भस्म कर देती है। कामादि को भस्म करके ज्ञान मनुष्य को पवित्र बनाता है । यह बृहस्पति ही ऊर्ध्वादिक् का अधिपति है। ज्ञान से ही मनुष्य अध्यात्म उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचता है। देव तो स्वयं दीप्त हैं औरों को ज्ञान दीप्ति से द्योतित करते हैं। ('देवो दीपनाद्वा द्योतनाद्वा') । २. (दक्षिणा) = दिव्य गुणों की सेना में प्रथम स्थान ज्ञान का है और द्वितीय दान का तो तृतीय स्थान यज्ञ का है। यज्ञ की मौलिक भावना निःस्वार्थ कर्म है। देव यज्ञशील होते हैं, वे तो हैं ही 'हविर्भुक्' । ४. (सोमः) = सौम्यता चौथा देव है। सौम्यता यह चौथा होता हुआ भी सर्वाधिक महत्त्व रखता है। सारे दिव्य गुणों के होने पर भी यदि यह सौम्यता न हो तो वे सब दिव्य गुण अखरने लगते हैं। सोम का दूसरा अर्थ semen = भी है। मनुष्य ने शक्ति का संयम करके ही दिव्य गुणों को विकसित करना है । यही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्म को प्राप्त करने का मार्ग है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्राण-साधना करें, जिससे हममें दिव्य गुण उत्पन्न हों। इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनें, जिससे देवसेनाओं के सेनापति बनें। ज्ञान, दान, निःस्वार्थता व सौम्यता इन चार दिव्य गुणों को न भूलें ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आसां देवसेनानाम्) एतासां विजिगीषुसेनानां (अभिभञ्जतीनां जयन्तीनाम्) शत्रुदलं भग्नं कुर्वन्तीनाम्-जयं प्राप्नुवन्तीनाम् (नेता) इन्द्रः-विद्युत्तुल्यो वीरो राजा (बृहस्पतिः) सर्वशास्त्रनिष्णातः सेनापतिः (दक्षिणा यज्ञः) दक्षिणभागे यज्ञो यस्य तथाभूतः परोपकारी (सोमः) शान्तस्वभावः सेनाप्रेरकश्च “सोमः सेनाप्रेरकः” [यजु० १७।४० दयानन्दः] तदधीनानाम्-सेनायां (मरुतः-अग्रं यन्तु) सैनिका अग्रं गच्छन्ति “लडर्थे लोट्” ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Of these armies of the Devas, divine forces of nature and humanity, men of noble intentions and far sight, breaking through and conquering evil and negative elements of life, Indra of lighting power is the leader and commander, Brhaspati, commanding knowledge, tactics and wide vision, is the guide with yajna on his right, and Soma, lover of peace and felicity, is the inspiration, while Maruts, warriors of passion and enthusiasm, march in front.