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क॒कर्द॑वे वृष॒भो यु॒क्त आ॑सी॒दवा॑वची॒त्सार॑थिरस्य के॒शी । दुधे॑र्यु॒क्तस्य॒ द्रव॑तः स॒हान॑स ऋ॒च्छन्ति॑ ष्मा नि॒ष्पदो॑ मुद्ग॒लानी॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kakardave vṛṣabho yukta āsīd avāvacīt sārathir asya keśī | dudher yuktasya dravataḥ sahānasa ṛcchanti ṣmā niṣpado mudgalānīm ||

पद पाठ

क॒र्कऽदे॑वे । वृ॒ष॒भः । आ॒सी॒त् । अवा॑वचीत् । सार॑थिः । अ॒स्य॒ । के॒शी । दुधेः॑ । यु॒क्तस्य॑ । द्रव॑तः । स॒ह । अन॑सा । ऋ॒च्छन्ति॑ । स्म॒ । निः॒ऽपदः॑ । मु॒द्ग॒लानी॑म् ॥ १०.१०२.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:102» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:20» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ककर्दवे) कुत्सित शब्द गर्वित शब्द करनेवाले शत्रु के लिए (वृषभः) वृषभ आकृतिवाला रथ-यान (युक्तः-आसीत्) योजित होता है (अस्य केशी) इसकी विद्युत् सारथि (सारथिः-अवावचीत्) पुनः-पुनः शब्द कराती है (अनसा सह) शकट के-रथयान के साथ (युक्तस्य दुधेः) संयुक्त दृढ (द्रवतः) दौड़ते हुए के (निष्पदः) निरन्तर चलती हुई की (मुद्गलानीम्) कला विद्युत्तरङ्ग माला को (ऋच्छन्ति) प्राप्त करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - गर्वित शत्रु के प्रति वृषभाकृति यान बनाना चाहिये और इसकी विद्युत् सारथि बनकर शत्रु के लिए घोषणा करावे, तीव्र गति से बिजली की तरङ्ग मालाओं को प्राप्त कराना चाहिये, शत्रु पर फेंकना चाहिये ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मुद्गलानी की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वृषभः) = वह शक्तिशाली प्रभु (ककर्दवे) = अन्तःशत्रुओं के हिंसन के लिए (युक्तः आसीत्) = योग के द्वारा संबद्ध किया हुआ था। योगांगों के अनुष्ठान से उस प्रभु का हमने उपासन किया। उस समय केशी ज्ञानरश्मियोंवाला (अस्य सारथिः) = जीव के शरीर रथ का संचालक वह प्रभु (अवावचीत्) = खूब ही उसे सन्मार्ग के उपदेश का देनेवाला हुआ । योगयुक्त होने पर वह प्रभु हृदयस्थरूपेण हमें ज्ञानोपदेश देते ही हैं। [२] इस ज्ञानोपदेश के होने पर (दुधेः) = इस (दुर्धर) = कठिनता से धारण करने योग्य, (द्रवतः) = इधर-उधर दौड़ते हुए, (अनसा सह) = इस शरीररथ के साथ (युक्तस्य) = युक्त हुए हुए मन के (निष्पदः) = [पद् गतौ ] गतिशून्य करनेवाले, स्थिर करनेवाले अभ्यासी लोग (मुद्गलानीम्) = 'मुद्गल' जीव की पत्नीरूप इस बुद्धि को (ऋच्छन्ति स्म) = अवश्य प्राप्त होते हैं। मन के स्थिर होने पर 'ऋतम्भरा प्रज्ञा' प्राप्त होती है। मानस स्थिरता बुद्धि प्राप्ति के लिए आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के साथ सम्पर्क होने पर सब वासनाओं का संहार हो जाता है। मानस स्थिरता के होने पर बुद्धि का विकास होता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ककर्दवे वृषभः-युक्तः आसीत्) कुत्सितशब्दकारिणे शत्रवे “कर्द कुत्सितशब्दे” [भ्वादि०] ‘ततः औणादिक उः प्रत्ययः’ वृषभाकृतिमान् रथो योजयितव्यो भवति (अस्य केशी सारथिः-अवावचीत्) अस्य सारथिर्विद्युदग्निः “केशी प्रकाशनात्” [निरु० १२।२५] “त्रयः केशिन ऋतुथा विचक्षे” [ऋ० १।१६४।४४] सारथिः पुनः पुनर्ध्वनिं कारयति (अनसा सहयुक्तस्य दुधेः-द्रवतः) शकटेन-पूर्वोक्तेन कलारथेन सह संयुक्तस्य दुर्धरस्य दृढस्य “रेफलोपश्छान्दसः” प्रापयमानस्य (निष्पदः-मुद्गलानीम्-ऋच्छन्ति) निरन्तरं पद्यमानाश्च कला विद्युत्तरङ्गमालां प्राप्नुवन्ति ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Generous and joyous, lord of evolution and progress is Indra, Vrshabha, Mudgala, terribly strong, committed to positivity. Its chariot conductor like the electric force in the firmament, magnetic force on earth and socio-political forces in society, is vocal, thunderous and far reaching like hair on the head and radiations of the sun. Of this determined, committed, radiant lord in state alongwith its conductive force, the allies are like atoms of energy in nature and individuals in society. These all join its consort power, Mudgalani, of their own will, without any coercion or outside basis of supportive and persuasive elements.