उपासना से शक्ति-सम्पन्नता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एनम्) = इस (वृषभम्) = शक्तिशाली व सब सुखों का वर्षण करनेवाले प्रभु को (उपयन्तः) = समीपता से प्राप्त होते हुए, अर्थात् प्रभु का उपासन करते हुए (नि अक्रन्दयन्) = खूब ही उस प्रभु का आह्वान करते हैं । (आजेः मध्ये) = इस जीवन संग्राम के मध्य में प्रभु [को] (अमेहयन्) = शक्ति का वर्षण कराते हैं। उपासना से उपासक अपने को प्रभु की शक्ति से सिक्त करता है । इसी शक्ति से ही तो वह संग्राम में विजय को प्राप्त करेगा। [२] (तेन) = अपने में उस प्रभु शक्ति के सेचन के द्वारा (मुद्गलः) = यह ओषधि वनस्पतियों का सेवन करनेवाला (प्रधने) = संग्राम में उत्कृष्ट ऐश्वर्य की प्राप्ति के निमित्तभूत संग्राम में (गवां जिगाय) = इन्द्रियरूप गौवों का विजय करता है। इस प्रकार विजय करता है जिससे कि (सूभर्वम्) = [भर्वति अत्तिकर्मा नि० २।८] ये इन्द्रियाँ उत्तम ही भोजनवाली होती हैं, इनका भरण उत्तमता से होता है । (शतवत्) = ये सौ वर्षोंवाली होती हैं, अर्थात् शतवर्ष पर्यन्त इनकी शक्ति जीर्ण नहीं होती। (सहस्रम्) = [सहस्] ये प्रसन्नता से परिपूर्ण होती हैं अथवा सहस्रों कार्यों को सम्पन्न करनेवाली होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के उपासन से शक्ति प्राप्त होती है। इस शक्ति से हम अन्तः शत्रुओं का पराजय करके जितेन्द्रिय बनते हैं। उससे इन्द्रियाँ उत्तम विषयों में विचरती हैं [सु+भव्], शतवर्षपर्यन्त शक्तिशाली बनी रहती हैं और हम उत्साह व उल्लास सम्पन्न बने रहते हैं ।