पदार्थान्वयभाषाः - [१] [सीरा नदी नाम नि० ४ । १९ । ८ सीरा: नाडी : १ । १७४ । ९ द०] (सीराः युनक्त) = नाड़ियों को निरुद्ध प्राणों से युक्त करो। प्राणायाम करते हुए प्राणों को उस-उस नाड़ी में रोकने का प्रयत्न करो। (युगा वितनुध्वम्) = योग के अंगों को अपने जीवन में विशेषरूप से विस्तृत करो। [२] इन योगांगों के अनुष्ठान से (कृते) = संस्कृत किये हुए (इह योनौ) = इस शरीररूप क्षेत्र में (बीजं) = सब भूतों के बीजभूत प्रभु को (वपत) = स्थापित करो। [३] ऐसा करने पर (गिरा) = वेदवाणी के द्वारा (नः) = हमारे लिए (सभराः) = भरण-पोषण से युक्त (श्रुष्टि:) = [ hearing] ज्ञान का श्रवण (असत्) = हो । इस हृदय में प्रभु को स्थापित करें, प्रभु हमें हृदयस्थरूपेण वेदज्ञान को प्राप्त कराएँगे। [४] इस प्रकार (सृण्यः) = यह गतिशील जीव (इत्) = निश्चय से (पक्कं नेदीयः) = उस पूर्ण परिपक्व प्रभु के समीप (एयात्) = [आ इयात्] सर्वथा प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - [क] प्राणायाम के अभ्यासी होकर इडा आदि नाड़ियों में हम प्राण-निरोध करें, [ख] योगांगों का अनुष्ठान करें, [ग] संस्कृत क्षेत्र [शरीर] में प्रभु का दर्शन करने के लिए यत्नशील हों, [घ] वेदज्ञान को प्राप्त करें, [ङ] गतिशील होकर प्रभु के समीप हों ।