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यु॒नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नुध्वं कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म् । गि॒रा च॑ श्रु॒ष्टिः सभ॑रा॒ अस॑न्नो॒ नेदी॑य॒ इत्सृ॒ण्य॑: प॒क्वमेया॑त् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yunakta sīrā vi yugā tanudhvaṁ kṛte yonau vapateha bījam | girā ca śruṣṭiḥ sabharā asan no nedīya it sṛṇyaḥ pakvam eyāt ||

पद पाठ

यु॒नक्त॑ । सीरा॑ । वि । यु॒गा । त॒नु॒ध्व॒म् । कृ॒ते । योनौ॑ । व॒प॒त॒ । इ॒ह । बीज॑म् । गि॒रा । च॒ । श्रु॒ष्टिः । सऽभ॑राः । अस॑त् । नः॒ । नेदी॑यः । इत् । सृ॒ण्यः॑ । प॒क्वम् । आ । इ॒या॒त् ॥ १०.१०१.३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:101» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:3


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सीरा) हलों को (युनक्त) युक्त करो जोड़ो बैलों के साथ (युगा) जोतों को (वि तनुध्वम्) बैलों में फैलाओ लगाओ (कृते योनौ) संस्कृत या सम्पन्न या छिन्न क्षेत्र भक्ति क्यारी हो जाने पर (इह बीजं वपत) बीज बोओ (च) और (गिरा श्रुष्टिः) अन्न की बाल (सभरा-असत्) पुष्ट हो जावे (नः-सृण्यः) हमारी दात्री-दराँती (इत्) अवश्य (पक्वं नेदीयः-एयात्) पके हुए नाल स्तम्भ के पास काटने को जाये ॥३॥
भावार्थभाषाः - हल चलाकर भूमि-खेत की क्यारी को तैयार करके बीज बोना पुनः सिञ्चन आदि करके जब अन्न का पौधा बढ़ जावे और बाल अन्न के दानों से भर जाये और पक जाये, तब उसे दराँती से काटकर अन्न प्राप्त करना चाहिये ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

योगांगों का अनुष्ठान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] [सीरा नदी नाम नि० ४ । १९ । ८ सीरा: नाडी : १ । १७४ । ९ द०] (सीराः युनक्त) = नाड़ियों को निरुद्ध प्राणों से युक्त करो। प्राणायाम करते हुए प्राणों को उस-उस नाड़ी में रोकने का प्रयत्न करो। (युगा वितनुध्वम्) = योग के अंगों को अपने जीवन में विशेषरूप से विस्तृत करो। [२] इन योगांगों के अनुष्ठान से (कृते) = संस्कृत किये हुए (इह योनौ) = इस शरीररूप क्षेत्र में (बीजं) = सब भूतों के बीजभूत प्रभु को (वपत) = स्थापित करो। [३] ऐसा करने पर (गिरा) = वेदवाणी के द्वारा (नः) = हमारे लिए (सभराः) = भरण-पोषण से युक्त (श्रुष्टि:) = [ hearing] ज्ञान का श्रवण (असत्) = हो । इस हृदय में प्रभु को स्थापित करें, प्रभु हमें हृदयस्थरूपेण वेदज्ञान को प्राप्त कराएँगे। [४] इस प्रकार (सृण्यः) = यह गतिशील जीव (इत्) = निश्चय से (पक्कं नेदीयः) = उस पूर्ण परिपक्व प्रभु के समीप (एयात्) = [आ इयात्] सर्वथा प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - [क] प्राणायाम के अभ्यासी होकर इडा आदि नाड़ियों में हम प्राण-निरोध करें, [ख] योगांगों का अनुष्ठान करें, [ग] संस्कृत क्षेत्र [शरीर] में प्रभु का दर्शन करने के लिए यत्नशील हों, [घ] वेदज्ञान को प्राप्त करें, [ङ] गतिशील होकर प्रभु के समीप हों ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सीरा युनक्त) सीराणि हलादीनि “सीरं कृषिसाधनं हलादिकम्” [यजु० १८।७ दयानन्दः] युङ्ध्वमनडुद्भिः सह (युगा वि तनुध्वम्) योक्त्राणि बलिवर्देषु वितानयत (कृते योनौ) सम्पन्नायां छिन्नायां योनौ क्षेत्रभक्त्यां सीतायाम् (इह बीजं वपत) अत्र बीजं निधापयत (च) अथ च (गिरा-श्रुष्टिः) अन्नस्य “अन्नं गिरः” [श० ८।५।३।५] “विराजः श्रुष्टि” [अथर्व० ३।१७।२] “अन्नं वै विराट्” [श० ७।५।३।१९] अन्नमाला-अन्नगुम्फा वा “अन्नं वै श्रुष्टिः” [श० ७।२।२।५] (सभरा-असत्) भरेण पोषणधर्मेण सह युक्ता भवेत् (नः-सृण्यः) अस्माकं दात्री (इत्-पक्वं नेदीयः-एयात्) खलु पक्वं स्तम्भं प्रति कर्त्तनाय समीपं गच्छेत् ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Take up the plough, yoke the bullocks and extend the process, and when the soil is prepared sow the seed. With songs of thanks and joy, let the crop grow green and mature, and when the grain is ripe, let the sickle approach to harvest the grain.