पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मन्द्रा) = आनन्द को प्राप्त करानेवाले स्तोत्रों को तुम (कृणुध्वम्) = करो । प्रभु-स्तवन में आनन्द का अनुभव करो। [२] (धियः) = प्रज्ञानों व कर्मों का (आतनुध्वम्) = विस्तार करो। वस्तुतः प्रभु का सच्चा स्तवन यही है कि ज्ञानपूर्वक कर्मों में हम व्यापृत रहें। [३] (नावम्) = इस शरीररूप नाव को (अरित्रपरणीम्) = ज्ञान व कर्मरूप आयुओं के द्वारा भवसागर से पार करनेवाली (कृणुध्वम्) = करो। शरीर को 'सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनहे सं०' इस मन्त्र में नाव से उपमित किया है, इस नाव के ज्ञान और कर्म ये ही दो चप्पू हैं । [४] (इष् कृणुध्वम्) = प्रेरणा को अपने अन्दर उत्पन्न करो। अन्तःस्थित प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाले बनो । (आयुधा अरं कृणुध्वम्) = इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि रूप उपकरणों को अलंकृत करो। [५] इन सुसंस्कृत उपकरणों के द्वारा (सखायः) = परस्पर मित्रभाव से वर्तते हुए तुम (यज्ञं प्राञ्चं प्रणयता) = यज्ञ को आगे-आगे ले चलो। यज्ञ की वृत्ति तुम्हारी बढ़ती चले । इन्द्रियों, मन व बुद्धि से हम यज्ञ को ही सिद्ध करनेवाले हों, श्रेष्ठतम कर्म ही इनके साध्य हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्तवन से हम अपनी बुद्धियों को संस्कृत करें। शरीर को नाव बनाएँ, ज्ञान व कर्म इसके चप्पू हों । प्रभु प्रेरणा को सुनें । इन्द्रियों, मन व बुद्धि को अलंकृत करें। इनके द्वारा यज्ञात्मक कर्मों को सिद्ध करें।