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म॒न्द्रा कृ॑णुध्वं॒ धिय॒ आ त॑नुध्वं॒ नाव॑मरित्र॒पर॑णीं कृणुध्वम् । इष्कृ॑णुध्व॒मायु॒धारं॑ कृणुध्वं॒ प्राञ्चं॑ य॒ज्ञं प्र ण॑यता सखायः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mandrā kṛṇudhvaṁ dhiya ā tanudhvaṁ nāvam aritraparaṇīṁ kṛṇudhvam | iṣkṛṇudhvam āyudhāraṁ kṛṇudhvam prāñcaṁ yajñam pra ṇayatā sakhāyaḥ ||

पद पाठ

म॒न्द्रा । कृ॒णु॒ध्व॒म् । धियः॑ । आ । त॒नु॒ध्व॒म् । नाव॑म् । अ॒रि॒त्र॒ऽपर॑णीम् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । इष्कृ॑णुध्वम् । आयु॒धा । अर॑म् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । प्राञ्च॑म् । य॒ज्ञम् । प्र । न॒य॒त॒ । स॒खा॒यः॒ ॥ १०.१०१.२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:101» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे समानज्ञानप्रकाशवाले जनों ! (मन्द्रा) तुम स्तुतिवचनों को (कृणुध्वम्) करो-सेवा में लाओ (धियः) कर्मों को (आ तनुध्वम्) शिल्पशाला में विस्तृत करो (अरित्रपरणीम्) परित्रों चप्पुओं से पार करानेवाली-चलनेवाली (नावम्) नौका को (कृणुध्वम्) करो-बनाओ पार में व्यापार कर्म के लिये (आयुधा) शस्त्रास्त्रों को (इष्कृणुध्वम्) तीक्ष्ण करो संग्राम के लिए (प्राञ्चम्-अरं कृणुध्वम्) अपने को सामने करो-आगे करो समाज सेवा के लिए (यज्ञं प्र नयत) यज्ञ को बढ़ाओ परोपकार के लिए ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि परमात्मा की स्तुति करते हुए साथ में शिल्प कार्यों को सांसारिक कार्यसिद्धि के लिए, नौकाओं को नदी समुद्र के पार जाने के लिए, शस्त्रास्त्रों के यथावसर संग्राम के लिए, अपने शरीर को समाजसेवा के लिए, यज्ञ को परोपकार के लिए करें ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तवन व यजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मन्द्रा) = आनन्द को प्राप्त करानेवाले स्तोत्रों को तुम (कृणुध्वम्) = करो । प्रभु-स्तवन में आनन्द का अनुभव करो। [२] (धियः) = प्रज्ञानों व कर्मों का (आतनुध्वम्) = विस्तार करो। वस्तुतः प्रभु का सच्चा स्तवन यही है कि ज्ञानपूर्वक कर्मों में हम व्यापृत रहें। [३] (नावम्) = इस शरीररूप नाव को (अरित्रपरणीम्) = ज्ञान व कर्मरूप आयुओं के द्वारा भवसागर से पार करनेवाली (कृणुध्वम्) = करो। शरीर को 'सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनहे सं०' इस मन्त्र में नाव से उपमित किया है, इस नाव के ज्ञान और कर्म ये ही दो चप्पू हैं । [४] (इष् कृणुध्वम्) = प्रेरणा को अपने अन्दर उत्पन्न करो। अन्तःस्थित प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाले बनो । (आयुधा अरं कृणुध्वम्) = इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि रूप उपकरणों को अलंकृत करो। [५] इन सुसंस्कृत उपकरणों के द्वारा (सखायः) = परस्पर मित्रभाव से वर्तते हुए तुम (यज्ञं प्राञ्चं प्रणयता) = यज्ञ को आगे-आगे ले चलो। यज्ञ की वृत्ति तुम्हारी बढ़ती चले । इन्द्रियों, मन व बुद्धि से हम यज्ञ को ही सिद्ध करनेवाले हों, श्रेष्ठतम कर्म ही इनके साध्य हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्तवन से हम अपनी बुद्धियों को संस्कृत करें। शरीर को नाव बनाएँ, ज्ञान व कर्म इसके चप्पू हों । प्रभु प्रेरणा को सुनें । इन्द्रियों, मन व बुद्धि को अलंकृत करें। इनके द्वारा यज्ञात्मक कर्मों को सिद्ध करें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे समानज्ञानप्रकाशकाः ! (मन्द्रा कृणुध्वम्) यूयं मन्द्राणि स्तुतिवचनानि “मदि-स्तुतिमोदमद” [भ्वादिः] ततो रक् औणादिकः-अध्यात्मयज्ञे कुरुत (धियः-आ तनुध्वम्) कर्माणि “धीः कर्मनाम” [निघ० २।१] विस्तारयत शिल्पशालायाम् (अरित्रपरणीं नावं कृणुध्वम्) अरित्रैः पारयित्रीं नौकां कुरुत, पारे व्यापारकायार्थं नद्यां (आयुधा-इष्कृणुध्वम्) शस्त्राणि निष्कृणुध्वं संस्कुरुत तीक्ष्णं कुरुत “संस्कर्त्तारं निष्कर्त्तारं संसाधकं छान्दसो नकारलोपः” [यजु० १२।११० दयानन्दः] ‘निष्कृण्वाना आयुधानीव-निरित्येष समित्येतस्य स्थाने’ [निरु० १२।७] सङ्ग्रामप्रसङ्गे (प्राञ्चम्-अरं कृणुध्वम्) स्वात्मानं सम्मुखं कुरुत समाजसेवायां (यज्ञं प्रनयत) परोपकाराय प्रवर्धयत ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Create peace and joy, develop rational thought and science and extend the field of action, design and develop boats and ships to cross the seas with oars, produce food for body, mind and soul, promote the arms of peace and security, and take the yajnic programme forward that faces you upfront, O my friends and friends of humanity.