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उद्बु॑ध्यध्वं॒ सम॑नसः सखाय॒: सम॒ग्निमि॑न्ध्वं ब॒हव॒: सनी॑ळाः । द॒धि॒क्राम॒ग्निमु॒षसं॑ च दे॒वीमिन्द्रा॑व॒तोऽव॑से॒ नि ह्व॑ये वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ud budhyadhvaṁ samanasaḥ sakhāyaḥ sam agnim indhvam bahavaḥ sanīḻāḥ | dadhikrām agnim uṣasaṁ ca devīm indrāvato vase ni hvaye vaḥ ||

पद पाठ

उत् । बु॒ध्य॒ध्व॒म् । सऽम॑नसः । स॒खा॒यः॒ । सम् । अ॒ग्निम् । इ॒न्ध्व॒म् । ब॒हवः॑ । सऽनी॑ळाः । द॒धि॒ऽक्राम् । अ॒ग्निम् । उ॒षस॑म् । च॒ । दे॒वीम् । इ॒न्द्र॒ऽव॒तः । अव॑से । नि । ह्व॒ये॒ । वः॒ ॥ १०.१०१.१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:101» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:18» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:1


ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में विद्वानों को कलायन्त्रनिर्माण करना तथा खेती कार्य के लिये कूप आदि बनाना, उसमें जलपात्रसहित चक्र राहट लगाना चाहिये, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (समनसः) समान मनवाले (सनीळाः) समान आश्रयवाले (सखायः) समान ख्यानवाले-समान ज्ञान चेतनावाले (बहवः) बहुसंख्यक-गणरूप में आये हुए मनुष्यों (उत् बुध्यध्वम्) उद्बुद्ध होवो (अग्निम्) अग्रणेता परमात्मा को (सम् इन्ध्वम्) अपने आत्मा में सम्यक् प्रकाशित करो (दधिक्राम्) मेघों को धारण करते हुए चलनेवाले वायु को (अग्निम्) पृथिवीस्थ अग्नि को (च) और (उषसं देवीम्) चमकती हुई उषा को (वः-इन्द्रावतः) इन तुम सब परमात्मा के आश्रयवालों को (अवसे) रक्षा के लिए (नि ह्वये) नियम से स्वीकार करता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - जलवृष्टि कराने के लिये बहुत से विद्वान् एक मन एक परमात्मा के आश्रय और एक भावना से एक उच्चध्वनि से मन्त्रोच्चारण करते हुए परमात्मा का ध्यान करें तथा आकाश में मेघों को उड़ाये ले जाते हुए वायु तथा पृथिवी की अग्नि और उषावेला में उनका नियम से उपयोग करें ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अग्न, उषा व इन्द्र' का आराधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सखायः) = परस्पर सखा बनकर, मित्रभाववाले होकर (समनसः) = समान मनवाले होते हुए, विरोधी भावनाओं से रहित हुए हुए (उद् बुध्यध्वम्) = उत्कृष्ट ज्ञानवाले बनो। परस्पर का विरोध सारी शक्ति को एक दूसरे को हानि पहुँचाने में ही नष्ट कर देता है। परस्पर मैत्री भाववाले होने पर हम शक्ति को ज्ञान प्राप्ति में लगाते हैं । [२] तुम (बहवः) = बहुत से व्यक्ति (सनीडाः) = समान नीडवाले, एक घर में रहनेवाले (अग्निम्) = अग्नि को (सं इन्ध्वम्) = अग्निकुण्ड में दीप्त करो। अर्थात् मिल करके अग्निहोत्र करो। प्रातः का अग्निहोत्र सायं तक और सायं का अग्निहोत्र प्रातः तक तुम्हें सौमनस्य को प्राप्त करायेगा। यह उत्तम मन ज्ञान प्राप्ति के लिए अनुकूल होगा। [३] इस (दधिक्रां अग्निम्) = [दधत् क्रामति] धारण के हेतु से रोगकृमियों पर आक्रमण करनेवाली इस अग्नि को (च) = तथा (देवीम्) = प्रकाशमयी (उषसम्) = उषा को (अवसे) = रक्षण के लिए (निह्वये) = मैं पुकारता हूँ । (इन्द्रावतः) = इन्द्रवाले (वः) = तुम सब देवों को भी रक्षण के लिए पुकारता हूँ । प्रकृति के सब सूर्यादि पिण्ड तेंतीस भागों में विभक्त हुए हुए तेंतीस देव कहलाते हैं। चौंतीसवें 'महादेव' हैं, ये ही देवराज् इन्द्र हैं । इन्द्र के साथ इन सब देवों को मैं रक्षण के लिए पुकारता हूँ । अग्निहोत्र के द्वारा अग्नि की उपासना करता हूँ, प्रातः प्रबुद्ध होकर उषा के स्वागत के द्वारा उषा की उपासना करता हूँ तथा प्रभु के स्तवन के द्वारा प्रभु का प्रिय होता हूँ । ये अग्नि उषा व प्रभु, अन्य देवों के द्वारा, मेरा रक्षण करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम परस्पर विरोध से ऊपर उठकर ज्ञान प्राप्ति में लगें। घरों में मिलकर अग्निहोत्र करें। बहुत सवेरे जागकर उषा का स्वागत करनेवाले हों । प्रभु का आराधन करें।

ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते विद्वद्भिः कलायन्त्रनिर्माणं कर्तव्यं तथा कृषिकार्याय भूमेर्विलेखनं सेचनाय च जलाशयो निर्मातव्यस्तत्र जलपात्रयुक्तचक्रं च योजितव्यमित्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (समनसः) समानमनस्काः (सनीकाः) समानाश्रयवन्तः (सखायः) समानख्यानाः (बहवः) बहुसंख्यकाः सन्तः (उत् बुध्यध्वम्) उद्बुद्धाः भवत (अग्निं सम् इन्ध्वम्) अग्रणेतारं परमात्मानं सम्यक् स्वात्मनि प्रकाशयत (दधिक्राम्-अग्निम्-उषसं देवीं वः-इन्द्रावतः) मेधान् दधत् धारयन् क्रामति गच्छति यस्तं मध्यस्थानकं वायुम्-अग्निं पृथिवीस्थानकं तथोषोदेवीं युष्मान् परमात्ववतः परमात्माश्रितान् (अवसे निह्वये) रक्षणाय नियमेन स्वीकरोमि “ह्वये स्वीकरोमि” [ऋ० १।६४।२६ दयानन्दः] ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Awake, arise, O friends of equal mind, light the fire together, more than many living and working together under the same one roof of equal order, lovers of energy, worshippers of Indra, one lord omnipotent of nature and entire humanity. I call upon you and exhort you for the sake of mutual defence and protection and for common progress of all. Light and develop the fire energy of the earth, atmospheric energy of thunder and lightning of the sky, and the divine energy of the rising dawn of the sun.