प्रच्छन्न व प्रकट दुष्टकृत से दूर
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वसवः) = वसुओ ! निवास के लिए आवश्यक तत्त्वो ! हम (गुहा) = प्रच्छन्न देश में, अर्थात् हृदय में (वः) = आपका (भूरि दुष्कृतम्) = बहुत पाप व अपराध (न चक्रम) = न करें। और (न) = ना ही (आविष्ट्यम्) = प्रकटरूप में होनेवाले (देवहेडनम्) = देवों के निरादर को करें। मन में [गुहा में] वसुओं के प्रति होनेवाला अपराध यही है कि वहाँ 'ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध' आदि घातक तत्त्वों को स्थान देना । प्रकट रूप में देवों का तिरस्कार यह है कि सूर्यादि के सम्पर्क में जीवन को न बिताना । 'ऐसे मकान में रहना जहाँ कि सूर्य किरणों व वायु का प्रवेश ठीक से न हो' यह देवों का तिरस्कार है। न तो हम मन में वसुओं के विनाशक ईर्ष्यादि भावों को स्थान दे और ना ही सूर्यादि से असंपृक्त जीवन को बिताएँ, सदा खुले में रहने का ध्यान करें। [२] हे (देवा:) = देवो ! इस प्रकार आपके विषय में प्रच्छन्न व प्रकट पापों से ऊपर उठने पर (नः) = हमें (अनृतस्य वर्षसः) = अनृतरूप की (माकि:) = प्राप्ति न हो। हमारा रूप सत्य व तेजस्वी हो । मन के दृष्टिकोण से ईर्ष्यादि से रहित तथा शरीर के दृष्टिकोण से तेजस्वीरूप ही सत्य रूप है। हम (सर्वतातिम्) = सब अच्छाइयों का विस्तार करनेवाले (अदितिम्) = स्वास्थ्य को (आवृणीमहे) = सर्वथा वरते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-मन में ईर्ष्यादि से ऊपर उठकर तथा खुले में जीवन बिताते हुए हम सत्यस्वरूपवाले हों ।