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इन्द्र॑स्य॒ नु सुकृ॑तं॒ दैव्यं॒ सहो॒ऽग्निर्गृ॒हे ज॑रि॒ता मेधि॑रः क॒विः । य॒ज्ञश्च॑ भूद्वि॒दथे॒ चारु॒रन्त॑म॒ आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrasya nu sukṛtaṁ daivyaṁ saho gnir gṛhe jaritā medhiraḥ kaviḥ | yajñaś ca bhūd vidathe cārur antama ā sarvatātim aditiṁ vṛṇīmahe ||

पद पाठ

इन्द्र॑स्य । नु । सुऽकृ॑तम् । दैव्य॑म् । सहः॑ । अ॒ग्निः । गृ॒हे । ज॒रि॒ता । मेधि॑रः । क॒विः । य॒ज्ञः । च॒ । भू॒त् । वि॒दथे॑ । चारुः॑ । अन्त॑मः । आ । स॒र्वऽता॑तिम् । अदि॑तिम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ १०.१००.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:100» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:16» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान् परमात्मा का (सुकृतम्) सुखसम्पादक (दैव्यम्) जीवन्मुक्त विद्वानों के लिए-हितकर (सहः-नु) बल अवश्य है (विदथे) अनुभवस्थान (गृहे) उपासकों के हृदय घर में (जरिता) दोषों को क्षीण करनेवाला (मेधिरः) मेधावी-मेधाप्रद (कविः) सर्वज्ञ (अग्निः) अग्रणायक है (यज्ञः) सङ्गमनीय (चारुः) सेवनीय (च) और (अन्तमः) अत्यन्त निकट (भूत्) है (सर्वतातिम्०) पूर्ववत् ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का ज्ञानबल जीवन्मुक्त विद्वानों के लिए अत्यन्त सुखसम्पादक है, वह उसके साक्षात् करने योग्य हृदय घर में दोषों को नष्ट करनेवाला मेधाप्रद विद्यमान है, उनके द्वारा सङ्गमनीय जीवन में धारण करने योग्य है, उस जगद्विस्तारक अविनाशी को अपनाना चाहिए ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दैव्यं सहः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रस्य) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु का (सहः) = बल (नु) = निश्चय से (सुकृतम्) = उत्तम कर्मों को करनेवाला तथा (दैव्यम्) = दिव्यगुणों का उत्पादक है। प्रभु की उपासना से हमें वह बल प्राप्त होता है, जिससे कि हम उत्तम ही कर्म करते हैं और अपने में दैवी सम्पत्ति को बढ़ानेवाले होते हैं। [२] (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु गृहे इस शरीररूप गृह में (जरिता) = [ जरिता = गरिता नि० १।७] ज्ञान का उपदेश करनेवाले हैं। (मेधिरः) = बुद्धि को देनेवाले हैं । (कविः) = ' कौति सर्वाः विद्या:' सब सत्य विद्याओं का उपदेश देनेवाले हैं। सर्वज्ञ होते हुए सब ज्ञानों को देते हैं । [२] (च) = और (यज्ञः) = वे सब कुछ देनेवाले प्रभु (विदथे) ज्ञानयज्ञों में (चारुः) = [चारयति] हमें सब ज्ञानों का भक्षण करानेवाले हैं और (अन्तमः) = हमारे अन्तिकतम हैं। हमारे हृदयों में ही निवास करते हुए वे प्रभु हमारे लिए ज्ञानों को देनेवाले हैं। हृदयस्थरूपेण ही वे ज्ञान का प्रकाश करते हैं। इनसे हम (सर्वतातिम्) = सब गुणों का विस्तार करनेवाले (अदितिम्) = स्वास्थ्य को आवृणीमहे सर्वथा वरते हैं । स्वास्थ्य ही 'धर्मार्थकाममोक्ष' सभी का आधार बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की उपासना से हमें धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य सुकृतं दैव्यं सहः-नु) ऐश्वर्यवतः परमात्मनः सुसुखसम्पादकं देवेभ्यो विद्वद्भ्यो जीवन्मुक्तेभ्यो-हितकरमुक्थ्यं बलमस्ति (विदथे) अनुभवस्थाने (गृहे जरिता मेधिरः कविः-अग्निः) उपासकस्य हृदये दोषाणां जरयिता मेधावी मेधाप्रदः सर्वज्ञोऽग्रणायको वर्त्तते (यज्ञः-चारुः-अन्तमः-च भूत्) सङ्गमनीयः सेवनीयः-अन्तिमतमो नितान्तो निकटश्चास्ति (सर्वतातिम्०) पूर्ववत् ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni in the home is a version and reflection of mighty lndra itself, holy performer, divine power, celebrant divinity, adorable in yajna, creator and giver of light and poetic vision, which is yajna itself, closest and most beautiful in the holiest creative and social acts.$We honour and adore Aditi, mother Infinity of universal and imperishable order of divine generosity.