पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः) = हमारे लिए (देवः सविता) = दिव्यगुणों का पुञ्ज, प्रेरक [सू प्रेरणे] व उत्पादक [सु अभिषवे] प्रभु (वयः) = उत्कृष्ट अन्न को (आसाविषत्) = उत्पन्न करे । (ऋजूयते) = ऋजु -सरल-मार्ग से चलनेवाले, (यजमानाय) = यज्ञशील, (सुन्वते) = सोम का अपने में अभिषव [उत्पादन] करनेवाले के लिए सोमशक्ति [वीर्य-शक्ति] को अपने में सुरक्षित करनेवाले के लिए प्रभु (पाकवत्) = अत्यन्त प्रशंसनीय [praiseworthy ] (वय:) = अन्न को दें, (यथा) = जिससे (देवान्) = दिव्यगुणों को (प्रतिभूषेम) = अपने में हम सुशोभित कर पायें। [२] अन्न की सात्त्विकता वृत्ति की सात्त्विकता का कारण बनती है । सात्त्विक अन्न के सेवन से हमारे में दिव्यगुणों का विकास होता है और हम इन दिव्यगुणों से अपने जीवन को सुशोभित कर पाते हैं । इस सात्त्विक अन्न के सेवन से हम (सर्वतातिम्) - सब दिव्यगुणों का विस्तार करनेवाले (अदितिम्) = स्वास्थ्य को आवृणीमहे वरते हैं । स्वस्थ बनकर सभी उत्तम चीजों के प्राप्त करने के योग्य होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ऋजुमार्ग से चलते हुए, यज्ञशील बनकर, सोम के सम्पादन के द्वारा हम उत्कृष्ट अन्न का सेवन करते हुए अपने जीवन को दिव्यगुणों से अलंकृत करते हैं।