द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय। अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥
dviṣo no viśvatomukhāti nāveva pāraya | apa naḥ śośucad agham ||
द्विषः॑। नः॒। वि॒श्व॒तः॒ऽमु॒ख॒। अति॑। ना॒वाऽइ॑व। पा॒र॒य॒। अप॑। नः॒। शोशु॑चत्। अ॒घम् ॥ १.९७.७
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
द्वेष के पार
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ।
हे विश्वतोमुख परमात्मँस्त्वं नो नावेव द्विषोऽतिपारय नोऽस्माकमघं शत्रूद्भवं दुःखं भवानपशोशुचत् ॥ ७ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is He (God) is taught further in the Seventh Mantra.
O Omnipresent God whose Glory is in every direction, take us across all misery caused by our internal enemies like the boat or ship to the other shore of the river or ocean. Burn away all our sins.
