वांछित मन्त्र चुनें

स पूर्व॑या नि॒विदा॑ क॒व्यता॒योरि॒माः प्र॒जा अ॑जनय॒न्मनू॑नाम्। वि॒वस्व॑ता॒ चक्ष॑सा॒ द्याम॒पश्च॑ दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa pūrvayā nividā kavyatāyor imāḥ prajā ajanayan manūnām | vivasvatā cakṣasā dyām apaś ca devā agniṁ dhārayan draviṇodām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। पूर्व॑या। नि॒ऽविदा॑। क॒व्यता॑। आ॒योः। इ॒माः। प्र॒ऽजाः। अ॒ज॒न॒य॒त्। मनू॑नाम्। वि॒वस्व॑ता। चक्ष॑सा। द्याम्। अ॒पः। च॒। दे॒वाः। अ॒ग्निम्। धा॒र॒य॒न्। द्र॒वि॒णः॒ऽदाम् ॥ १.९६.२

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:96» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:15» मन्त्र:2


690 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यों को जो (पूर्वया) प्राचीन (निविदा) वेदवाणी (कव्यता) जिससे कि कविताई आदि कामों का विस्तार करें, उससे (मनूनाम्) विचारशील पुरुषों के समीप (आयोः) सनातन कारण से (इमाः) इन प्रत्यक्ष (प्रजाः) उत्पन्न होनेवाले प्रजाजनों को (अजनयन्) उत्पन्न करता है वा (विवस्वता) (चक्षसा) सब पदार्थों को दिखानेवाले सूर्य्य से (द्याम्) प्रकाश (आपः) जल (च) पृथिवी वा ओषधि आदि पदार्थों तथा जिस (द्रविणोदाम्) धन देनेवाले (अग्निम्) परमेश्वर को (देवाः) आप्त विद्वान् जन (धारयन्) धारण करते हैं (सः) वह नित्य उपासना करने योग्य है ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - ज्ञानवान् अर्थात् जो चेतनायुक्त है, उसके विना उत्पन्न किये कुछ जड़ पदार्थ कार्य्य करनेवाला आप नहीं उत्पन्न हो सकता, इससे समस्त जगत् के उत्पन्न करनेहारे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर को सब मनुष्य मानें अर्थात् तृणमात्र जो आप से नहीं उत्पन्न हो सकता तो यह कार्य्य जगत् कैसे उत्पन्न हो सके, इससे इसको उत्पन्न करनेवाला जो चेतनरूप है, वही परमेश्वर है ॥ २ ॥
690 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मनुष्योत्पत्ति व वेदज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः - १. (सः) = वे प्रभु (पूर्वया) = सृष्टि के आरम्भ में होनेवाली (निविदा) = निश्चयात्मक ज्ञान देनेवाली (कव्यता) = काव्यमय इस वेदवाणी के साथ (आयोः इमाः प्रजाः) = मनुष्य की इन प्रजाओं को (अजनयत्) = जन्म देते हैं । प्रभु ने मनुष्य को जन्म दिया तो साथ ही साथ उन्हें वेदज्ञान भी प्राप्त करा दिया । बिना ज्ञान के मनुष्य इन पदार्थों का ठीक प्रयोग कैसे कर सकता था ?  २. इस वेदज्ञान को प्राप्त करनेवाले (देवाः) = देववृत्ति के व्यक्ति (मनूनाम्) = विचारशील पुरुषों के (विवस्वता) = [विवासनवता] अन्धकार को दूर करनेवाले (चक्षसा) = प्रकाश से (द्याम्) = ज्ञान की ज्योति को (अपः च) = और कर्मों को (धारयन्) = धारण करते हैं । ज्ञानपूर्वक कर्म करते हुए ये लोग (अग्निम्) = उस अग्रणी (द्रविणोदाम्) = सब द्रव्यों को देनेवाले प्रभु को धारण करते हैं । देव वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं , उसका मनन करते हैं [मनूनाम्] । उस मनन से उत्पन्न ज्ञान - ज्योति में वे अपने कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से देखते हैं तथा ज्ञानपूर्वक कर्मों को करते हुए वे प्रभु के सच्चे उपासक बनते हैं और अन्ततः उस प्रभु को धारण करनेवाले बनते हैं ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ने मनुष्य को जन्म दिया , साथ ही वेदज्ञान दिया । इसके मनन से देव लोग ज्ञान प्राप्त करते हैं , तदनुसार कर्म करते हुए वे प्रभु का उपासन करते हुए उसे हृदय में धारण करनेवाले बनते हैं ।   
690 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स परमेश्वरः कीदृश इत्युपदिश्यते ।

अन्वय:

मनुष्यैर्यः पूर्वया निविदा कव्यतामनूनामायोरिमाः प्रजा अजनयज्जनयति विवस्वता चक्षसा द्यामपः पृथिव्योषध्यादिकं च यं द्रविणोदामग्निं परमेश्वरं देवा धारयन् धारयन्ति स नित्यमुपासनीयः ॥ २ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) जगदीश्वरः (पूर्वया) प्राचीनया (निविदा) वेदवाचा (कव्यता) कव्यं कवित्वं तन्यते यया तया (आयोः) सनातनात् कारणात् (इमाः) प्रत्यक्षाः (प्रजाः) प्रजायन्ते यास्ताः (अजनयत्) जनयति (मनूनाम्) मननशीलानां मनुष्याणां सन्निधौ (विवस्वता) सूर्य्येण (चक्षसा) दर्शकेन (द्याम्) प्रकाशम् (अपः) जलानि (च) पृथिव्योषध्यादिसमुच्चये (देवाः) आप्ता विद्वांसः (अग्निम्) परमेश्वरम्। अन्यत्पूर्ववत् ॥ २ ॥
भावार्थभाषाः - नहि ज्ञानवतोत्पादकेन विना किञ्चिज्जडं कार्य्यकरं स्वयमुत्पत्तुं शक्नोति। तस्मात्सकलजगदुत्पादकं सर्वशक्तिमन्तं जगदीश्वरं सर्वे मनुष्या मन्येरन् ॥ २ ॥
690 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With the ancient and eternal poetry of omniscience and from the eternal cause, He, the lord of light, creates these children of Manus, men of thought and vision. And with the brilliant light of the sun, he creates the regions of light and waters and others such as the earth. The devas, divinities of nature and the noblest of humanity, hold on to him and bear on the fire of yajna from generation to generation, universal giver as He is.
690 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is God is taught in the 2nd Mantra.

अन्वय:

Men should always adore that Almighty God who is Omniscient and who along with His eternal Vedic Speech generates all these children of thoughtful persons-subjects from the eternal Matter. With his Omnipotence, He has created the sun and other luminaries, different waters, earth herbs plants etc. Him alone who is the Giver of all wealth, enlightened truthful persons uphold in their exemplary lives.

पदार्थान्वयभाषाः - (निविदा) वेदवाचा = With Vedic Speech. (अग्निम्) परमेश्वरम् = God. (आयो:) सनातनात् कारणात् = From the eternal cause i. e. यन्निविद्भिर्न्यवेदयत् तन्निविदां निवित्वम् (तैति ० ऐतरेय ३.९, तैति० २.२८.५ ), ब्रह्माग्नि: (शत० १. ३.३.१६ )।
भावार्थभाषाः - It is not possible for an inanimate thing like matter to produce anything without a conscious being. Therefore all men should believe in one God who is the Almighty Creator of the whole world.
690 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्ञानवान अर्थात जो चेतनयुक्त आहे त्याच्याशिवाय जड पदार्थ क्रियान्वित होऊ शकत नाही व स्वतःच्या स्वतः उत्पन्न होऊ शकत नाही. त्यामुळे संपूर्ण जगाला उत्पन्न करणाऱ्या सर्वशक्तिमान जगदीश्वराला सर्व माणसांनी मानावे अर्थात तृणसुद्धा स्वतःच्या स्वतः उत्पन्न होऊ शकत नाही तर हे कार्यजगत कसे उत्पन्न होऊ शकेल? यामुळे याला उत्पन्न करणारा जो चेतनरूपी आहे तोच परमेश्वर आहे. ॥ २ ॥