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मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः। माध्वी॑र्नः स॒न्त्वोष॑धीः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ | mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मधु॑। वाताः॑। ऋ॒त॒य॒ते। मधु॑। क्ष॒र॒न्ति॒। सिन्ध॑वः। माध्वीः॑। नः॒। स॒न्तु॒। ओष॑धीः ॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:90» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:18» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

विद्या से क्या उत्पन्न होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे पूर्ण विद्यावाले विद्वानो ! जैसे तुम्हारे लिये और (ऋतायते) अपने को सत्य व्यवहार चाहनेवाले पुरुष के लिये (वाताः) वायु (मधु) मधुरता और (सिन्धवः) समुद्र वा नदियाँ (मधु) मधुर गुण को (क्षरन्ति) वर्षा करती हैं, वैसे (नः) हमारे लिये (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधि (माध्वीः) मधुरगुण के विशेष ज्ञान करानेवाली (सन्तु) हों ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - हे पढ़ाने वालो ! तुम और हम ऐसा अच्छा यत्न करें कि जिससे सृष्टि के पदार्थों से समग्र आनन्द के लिये विद्या करके उपकारों को ग्रहण कर सकें ॥ ६ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम कर्मवाले के लिए माधुर्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. (ऋतायते) = गतमन्त्र के अनुसार श्रुति के प्रमाण से ऋत कर्मों को करनेवाले के लिए (वाताः) = वायुएँ (मधु) = माधुर्य को लिये हुए होती हैं । यज्ञात्मक कर्म ऋत हैं, अयज्ञीय कर्म अनृत हैं, अतः 'ऋतायते' का भाव 'यज्ञात्मक कर्मों को अपनानेवाले के लिए' हो जाता है । इस यज्ञशील पुरुष के लिए वायुएँ मधुर होती हैं, अर्थात् इसके स्वास्थ्य पर उनका अच्छा ही प्रभाव होता है । इस ऋतायत् पुरुष के लिए (सिन्धवः) = नदियाँ (मधु क्षरन्ति) = मधुर जल को ही बहानेवाली होती हैं । ३. हम भी ऋतायत् बनें और (ओषधीः) = पृथिवी से उत्पन्न होनेवाली ये सब ओषधियाँ (नः) = हमारे लिए (माध्वीः सन्तु) = मधुर ही हों । जिस समय मनुष्यों का जीवन यज्ञमय होता है तब सम्पूर्ण लोक भी उसके लिए अनुकूलता लिये हुए होते हैं । यज्ञशील का ही दोनों लोकों में कल्याण होता है । हमारे कर्म उत्तम होंगे तो वायु, जल व ओषधियाँ सब हमारे लिए कल्याणकर होंगी ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = हमारे कर्म यज्ञात्मक हों, जिससे हमें वायु, जल व ओषधियों की अनुकूलता प्राप्त हो ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

विद्यया किं जायत इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे पूर्णविद्य ! यथा युष्मभ्यमृतायते च वाता मधु सिन्धवश्च मधु क्षरन्ति तथा न ओषधीर्माध्वीः सन्तु ॥ ६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मधु) मधुरं ज्ञानम् (वाताः) पवनाः (ऋतायते) ऋतमात्मन इच्छवे। वा च्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति क्यचीत्वं न। (मधु) मधुताम् (क्षरन्ति) वर्षन्ति (सिन्धवः) समुद्रा नद्यो वा (माध्वीः) मधुविज्ञाननिमित्तं विद्यते यासु ताः। मधोर्ञ च। (अष्टा०४.४.१२९) अनेन मधुशब्दाञ् ञः। ऋत्व्यवास्त्व्य० इति यणादेशनिपातनम्। वाच्छन्दसीति पूर्वसवर्णादेशः। (नः) अस्मभ्यम् (सन्तु) (ओषधीः) सोमलतादय ओषध्यः। अत्रापि पूर्ववत्पूर्वसवर्णदीर्घः ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - हे अध्यापका ! यूयं वयं चैवं प्रयतेमहि यतः सर्वेभ्यः पदार्थेभ्योऽखिलानन्दाय विद्ययोपकारान् ग्रहीतुं शक्नुयाम ॥ ६ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Sweet as honey the winds blow for the soul of simplicity and naturalness. The waters rain, rivers flow and the oceans roll sweet as honey. May the herbs too be sweet as honey for us all.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the result of knowledge is taught in the 6th Mantra.

अन्वय:

O great scholars, as to you and for the man who speaks the truth and desires always to follow the right path prescribe! ed by the Vedas and perform the Yajnas, winds bring sweetness, as the rivers bring sweet waters, so may the plants be sweet for us or may they yield sweetness to us.

पदार्थान्वयभाषाः - (मधु) मधुरं ज्ञानम् = Sweet knowledge.
भावार्थभाषाः - O teachers, you and all of us may so put forth united efforts as to take benefit from all objects with knowledge for the enjoyment of happiness and bliss for all.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे अध्यापकानो! तुम्ही व आम्ही मिळून संपूर्ण आनंदासाठी असा प्रयत्न करावा की, ज्यामुळे सृष्टीच्या पदार्थांपासून विद्येद्वारे उपकार ग्रहण करता यावेत. ॥ ६ ॥