वांछित मन्त्र चुनें
558 बार पढ़ा गया

उ॒त नो॒ धियो॒ गोअ॑ग्राः॒ पूष॒न्विष्ण॒वेव॑यावः। कर्ता॑ नः स्वस्ति॒मतः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta no dhiyo goagrāḥ pūṣan viṣṇav evayāvaḥ | kartā naḥ svastimataḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। नः॒। धियः॑। गोऽअ॑ग्राः। पूष॑न्। विष्णो॒ उति॑। एव॑ऽयावः। कर्त॑। नः॒। स्व॒स्ति॒ऽमतः॑ ॥

558 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:90» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पूषन्) विद्या और उत्तम शिक्षा से पोषण करने वा (विष्णो) समस्त विद्याओं में व्यापक होने वा (एवयावः) जिससे सब व्यवहार ज्ञात होता है, उस अगाध बोध को प्राप्त होनेवाले विद्वान् लोगो ! तुम (नः) हम लोगों के लिये (गोअग्राः) इन्द्रिय अग्रगामी जिनमें हों, उन (धियः) उत्तम बुद्धि वा उत्तम कर्मों को (कर्त्त) प्रसिद्ध करो (उत) उसके पश्चात् (नः) हम लोगों को (स्वस्तिमतः) सुखयुक्त करो ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - पढ़नेवालों को चाहिये कि पढ़ानेवाले जैसे विद्या की शिक्षा करे, वैसे उनका ग्रहण कर अच्छे विचार से नित्य उनकी उन्नति करें ॥ ५ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्रुत्यानुसारिणी क्रिया [वेदानुकूल कर्म]

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (पूषन्) = सबका पोषण करनेवाले प्रभो ! (विष्णो) = [विष् व्याप्तौ] सर्वव्यापक प्रभो ! (एवयावः) = [एवैः याति] सर्वदा क्रियाओं के साथ विचरण करनेवाले प्रभो ! [स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च] आप (नः धियः) = हमारे कर्मों को (गो अग्राः) = वेदवाणी की प्रमुखतावाला (कर्त) = कीजिए । हमारा प्रत्येक कर्म वेदानुकूल हो । धर्म के विषय में परम प्रमाण श्रुति ही तो है । हमारे कर्म श्रुतिमूलक हों । वेद में हमारे जो कर्म प्रतिपादित हैं हम उन्हें ही करनेवाले हों । २. यहाँ 'पूषन्' शब्द पोषण का वाचक होता हुआ 'बल' का संकेत कर रहा है । 'विष्णो' शब्द व्यापकता का प्रतिपादन करता हुआ सर्वज्ञता का सूचक है । 'एवयावः' में क्रिया का संकेत है ही । प्रभु में ये 'बल, ज्ञान व क्रिया' स्वभावतः हैं ही । हम भी इन तीनों को अपनाकर ही धर्ममार्ग पर चलनेवाले होते हैं । "ज्ञान, बल व क्रिया" में से किसी की भी कमी हमारे जीवन को अधूरा कर देती है । ३. (उत) = और इस प्रकार हे प्रभो ! हमारे कर्मों को श्रुति के अनुकूल करते हुए आप (नः) = हमें (स्वस्तिमतः) = कल्याणवाला (कर्त) = कीजिए । धर्म का मार्ग ही सुख का मार्ग हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = हम शरीर की शक्ति का पोषण करें । ज्ञान को व्यापक बनाएँ । क्रियाशील हों । हमारी क्रियाएँ श्रुतिमूलक हों, जिससे हमारा कल्याण हो ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे पूषन् विष्णवेवयावश्च विद्वांसो ! यूयं नोऽस्मभ्यं गोअग्रा धियः कर्त्तः। उतापि नोऽस्मान् स्वस्तिमतः कर्त्तः ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (नः) अस्मभ्यम् (धियः) उत्तमाः प्रज्ञाः कर्माणि च (गोअग्राः) गाव इन्द्रियाण्यग्रे यासां ताः। सर्वत्र विभाषा गोः। (अष्टा०६.१.१२२) अनेन सूत्रेणाऽत्र प्रकृतिभावः। (पूषन्) विद्याशिक्षाभ्यां पुष्टिकर्त्तः (विष्णो) सर्वविद्यासु व्यापनशील (एवयावः) एति जानाति सर्वव्यवहारं येन स एवो बोधस्तं याति प्राप्नोति प्रापयति वा तत्सम्बुद्धौ। मतुवसोरादेशे वन उपसंख्यानम्। (अष्टा०वा०८.३.१) अनेन वार्त्तिकेनात्र सम्बोधने रुः। (कर्त्त) कुरुत। अत्र बहुलं छन्दसीति विकरणस्य लुक् लोडादेशस्य तस्य स्थाने तबादेशः। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घश्च। (नः) अस्मान् (स्वस्तिमतः) सुखयुक्तान् ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - अध्येतृभिर्यथाऽध्यापका विद्याशिक्षाः कुर्य्युस्तथैव सङ्गृह्यैताः सुविचारेण नित्यमुन्नेयाः ॥ ५ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pusha, lord of health and growth, Vishnu, lord omnipresent, and the leading man of enlightenment may, we pray, guide us to the intelligence and imagination which may issue in the right sense of perception, will and action, and may they confirm us in the good life of plenty and well-being.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should they ( learned) men) do is taught in the fifth Mantra.

अन्वय:

O our nourisher by giving us wisdom and good education, O great scholar pervading in all sciences i. e. well versed in them, O highly educated person, imparting that knowledge to others, give us good advice and prompt us to do noble deeds with our senses. Please make us full of happiness.

पदार्थान्वयभाषाः - (धियः) उत्तमाः प्रज्ञा: कर्मारिण च = Good intellect or advice and good actions. धोरितिकर्मनाम (निघ० २.१ ) धीरिति प्रज्ञानाम (निघ० ३.६) (विष्णो) सर्वविद्यासु व्यापनशील = O Scholar well-versed in all sciences. (एवयाव:) एति जानाति सद्व्यबहारं येन स एवो बोधः तं याति प्राप्नोति प्रापयति वा तत्सम्बुद्धौ । = Full of knowledge and giver of that knowledge to others.
भावार्थभाषाः - It is the duty of the students together or collect all the knowledge and education got from the teachers and to spread and advance them thoughtfully.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - अध्ययन करणाऱ्यांनी अध्यापन करणाऱ्याप्रमाणे शिक्षण घ्यावे. तसेच ते ग्रहण करून सुविचाराने सदैव उन्नत व्हावे. ॥ ५ ॥