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पृष॑दश्वा म॒रुतः॒ पृश्नि॑मातरः शुभं॒यावा॑नो वि॒दथे॑षु॒ जग्म॑यः। अ॒ग्नि॒जि॒ह्वा मन॑वः॒ सूर॑चक्षसो॒ विश्वे॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑मन्नि॒ह ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pṛṣadaśvā marutaḥ pṛśnimātaraḥ śubhaṁyāvāno vidatheṣu jagmayaḥ | agnijihvā manavaḥ sūracakṣaso viśve no devā avasā gamann iha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पृष॑त्ऽअश्वाः। म॒रुतः॑। पृश्नि॑ऽमातरः। शु॒भ॒म्ऽयावा॑नः। वि॒दथे॑षु। जग्म॑यः। अ॒ग्नि॒ऽजि॒ह्वाः। मन॑वः। सूर॑ऽचक्षसः। विश्वे॑। नः॒। दे॒वाः। अव॑सा। आ। ग॒म॒न्। इ॒ह ॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:89» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:16» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर ईश्वर की उपासना करनेवाले मनुष्यों को कैसा होना चाहिये, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शुभंयावानः) जो श्रेष्ठ व्यवहार की प्राप्ति कराने (अग्निजिह्वाः) और अग्नि को हवनयुक्त करनेवाले (मनवः) विचारशील (सूरचक्षसः) जिनके प्राण और सूर्य में प्रसिद्ध वचन वा दर्शन है (पृषदश्वाः) सेना में रङ्ग-विरङ्ग घोड़ों से युक्त पुरुष (विदथेषु) जो कि संग्राम वा यज्ञों में (जग्मयः) जाते हैं, वे (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् लोग (इह) संसार में (नः) हम लोगों को (अवसा) रक्षा आदि व्यवहारों के साथ (पृश्निमातरः) आकाश से उत्पन्न होनेवाले (मरुतः) पवनों के तुल्य (आ) (अगमन्) आवें प्राप्त हुआ करें ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैस बाहर और भीतरले पवन सब प्राणियों के सुख के लिये प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् लोग सबके सुख के लिये प्रवृत्त होवें ॥ ७ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मरुत् और विश्वेदेव

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! आपकी कृपा से (मरुतः) = प्राण (अवसा) = रक्षण के हेतु से (इह) = इस जीवन में (नः) = हमें (आगमन्) = प्राप्त हों । कैसे प्राण - [क] (पृषदश्वाः) = [पृष् to sprinkle] रेतः कणों की ऊर्ध्वगति के द्वारा शक्ति से सिक्त किया है इन्द्रियों को जिन्होंने, [ख] (पृश्निमातरः) = [पृश्नि = A ray of light] जो ज्ञान की किरणों का निर्माण करनेवाले हैं । प्राण बुद्धि की तीव्रता के द्वारा ज्ञान को दीप्त करते हैं । प्राणसाधना से मलों का क्षय होता है । मलक्षय से ज्ञान की दीप्ति होती है और मनुष्य प्रभु - दर्शन के योग्य बनता है, [ग] (शुभंयावानः) = ये मरुत् सदा शुभ की ओर चलनेवाले हैं । शरीर की नीरोगता, मन की निर्मलता और बुद्धि की तीव्रता इन्हीं पर निर्भर करती है, [घ] ये मरुत् (विदथेषु जग्मयः) = यज्ञों में चलनेवाले होते हैं । प्राणसाधक पुरुष यज्ञमय जीवनवाला बनता है । २. इन प्राणों की साधना के परिणामस्वरूप (विश्वेदेवाः) देववृति के सब ज्ञानी पुरुष (अवसा) = ज्ञान से प्रीणित करने के हेतु से (इह) = इस जीवन में (नः) = हमें (आगमन्) = प्राप्त हों । ये देव [क] (अग्नि - जिह्वाः) = अग्नि के समान जिह्वावाले हैं । सब पदार्थों को प्रकाशित करनेवाली वाणीवाले हैं । अग्नि जैसे अपनी ज्वालारूप जिह्वा से सब मलों को भस्मसात् करती चलती है, उसी प्रकार ये देव अपनी वाणी की प्रेरणा से श्रोताओं के मन के मलों को दग्ध करनेवाले होते हैं, [ख] (मनवः) = ये विचारशील होते हैं और [ग] (सूरचक्षसः) सूर्य के समान प्रकाशवाले होते हैं । इन देवों व विद्वानों के सम्पर्क में आकर हम भी ज्ञानी बनते हैं । इन देवों से दिया हुआ ज्ञान हमारा रक्षण व प्रीणन करनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = हम प्राणसाधना और विद्वानों का संग करें ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तदुपासकैर्मनुष्यैः कथं भवितव्यमित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

शुभंयावानोऽग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसः पृषदश्वा विदथेषु जग्मयो विश्वेदेवा इह नोऽस्मभ्यमवसा पृश्निमातरो मरुत इवागमन् ॥ ७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पृषदश्वाः) सेनाया पृषान्तोऽश्वा येषान्ते (मरुतः) वायवः (पृश्निमातरः) आकाशादुत्पद्यमाना इव (शुभंयावानः) शुभस्य प्रापकाः। अत्र तत्पुरुषे कृति बहुलमिति बहुलवचनाद् द्वितीयाया अलुक्। (विदथेषु) संग्रामेषु यज्ञेषु वा। (जग्मयः) गमनशीलाः (अग्निजिह्वाः) अग्निर्जिह्वाः हूयमानो येषान्ते (मनवः) मननशीलाः (सूरचक्षसः) सूरे सूर्ये प्राणे वा चक्षो व्यक्तं वचो दर्शनं वा येषान्ते (विश्वे) सर्वे (नः) अस्मान् (देवाः) विद्वांसः (अवसा) रक्षणादिना सह वर्त्तमानाः (आ) (अगमन्) आगच्छन्तु प्राप्नुवन्तु। अत्र लिङर्थे लुङ्प्रयोगः। (इह) अस्मिन् संसारे ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा बाह्याभ्यन्तरस्था वायवः सर्वान् प्राणिनः सुखाय प्राप्नुवन्ति, तथैव विद्वांसः सर्वेषा प्राणिनां सुखाय प्रवर्त्तेरन् ॥ ७ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Maruts, tempestuous heroes of war, of a variety of horses and chariots, children of the earth, lovers of good and beauty, moving to yajnas and marching to battles, having tongues of fire, thoughtful, radiant as the sun, all of them choice nobilities of the world may, we pray, come to us with the gift of protection and progress.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should be the worshippers or devotees of God is taught further in the seventh Mantra.

अन्वय:

May all enlightened truthful persons who lead us towards God, who are performers of Yajnas by kindling fire, or realisers of Prana or vital energy, thoughtful. radiant like the sun, whose horses are spotted. gracefully moving come to us in our Yajnas (non-violent sacrifices) with their power of protection and preservation like the winds born of the sky.

पदार्थान्वयभाषाः - (पृश्निमातरः मरुतः) आकाशात् उत्पद्यमानाः वायवः इव = Like the airs or winds born out of the sky. (पृश्निरिति साधारणनाम (निघ० १.४) आकाशान्तरिक्षसाधारणमिति यावत्)(सूरचक्षसः)सूरे सूर्ये प्राणो वा चक्ष: व्यक्तवचोदर्शनं वा येषाम् = Radiant like the sun or realisers of the Prana. (चक्ष-व्यक्तायां वाचि दर्शनेऽपि)
भावार्थभाषाः - As the airs, within in the form of Prana and without, cause happiness to all beings, in the same manner, learned persons should always be engaged in causing happiness to all creatures.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे बाहेरचे व आतले वायू सर्व प्राण्यांच्या सुखासाठी असतात तसे विद्वान लोकांनी सर्वांच्या सुखासाठी प्रवृत्त व्हावे. ॥ ७ ॥