वांछित मन्त्र चुनें
862 बार पढ़ा गया

तन्नो॒ वातो॑ मयो॒भु वा॑तु भेष॒जं तन्मा॒ता पृ॑थि॒वी तत्पि॒ता द्यौः। तद् ग्रावा॑णः सोम॒सुतो॑ मयो॒भुव॒स्तद॑श्विना शृणुतं धिष्ण्या यु॒वम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tan no vāto mayobhu vātu bheṣajaṁ tan mātā pṛthivī tat pitā dyauḥ | tad grāvāṇaḥ somasuto mayobhuvas tad aśvinā śṛṇutaṁ dhiṣṇyā yuvam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत्। नः॒। वातः॑। म॒यः॒ऽभु। वा॒तु॒। भे॒ष॒जम्। तत्। मा॒ता। पृ॒थि॒वी। तत्। पि॒ता। द्यौः। तत्। ग्रावा॑णः। सो॒म॒ऽसुतः॑। म॒यः॒ऽभुवः॑। तत्। अ॒श्वि॒ना॒। शृ॒णु॒त॒म्। धि॒ष्ण्या॒। यु॒वम् ॥

862 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:89» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (धिष्ण्या) शिल्पविद्या के उपदेश करने और (अश्विना) पढ़ने-पढ़ानेवालो ! (युवम्) तुम दोनों जो (शृणुतम्) सुनो (तत्) उस (मयोभु) सुखदायक उत्तम (भेषजम्) सब दुःखों को दूर करनेहारी ओषधि को (नः) हम लोगों के लिये (वातः) पवन के तुल्य वैद्य (वातु) प्राप्त करे वा (पृथिवी) विस्तारयुक्त भूमि जो कि (माता) माता के समान मान-सम्मान देने की निदान है वह (तत्) उस मान करानेहारे जिससे कि अत्यन्त सुख होता और समस्त दुःख की निवृत्ति होती है, औषधि को प्राप्त करावे वा (द्यौः) प्रकाशमय सूर्य्य (पिता) पिता के तुल्य जो कि रक्षा का निदान है, वह (तत्) उस रक्षा करानेहारे जिससे कि समस्त दुःख की निवृत्ति होती है, औषधि को प्राप्त करे वा (सोमसुतः) औषधियों का रस जिनसे निकाला जाय (तत्) वह कर्म तथा (ग्रावाणः) मेघ आदि पदार्थ (तत्) जो उनसे रस का निकालना वा जो (मयोभुवः) सुख के करानेहारे उक्त पदार्थ हैं, वे (तत्) उस क्रियाकुशलता और अत्यन्त दुःख की निवृत्ति करानेवाले ओषधि को प्राप्त करें ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - शिल्पविद्या की उन्नति करनेहारे जो उसके पढ़ने-पढ़ानेहारे विद्वान् हैं, वे जितना पढ़के समझें उतना यथार्थ सबके सुखके लिये नित्य प्रकाशित करें, जिससे हम लोग ईश्वर की सृष्टि के पवन आदि पदार्थों से अनेक उपकारों को लेकर सुखी हों ॥ ४ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मयोभु - भेषजम्

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के अनुसार देवों के गुणों का धारण करने पर सब देव हमारे अनुकूल होते हैं, उस समय हम यह प्रार्थना करने के पात्र होते हैं कि (तत्) = देवाराधन करने पर (वातः) = वायु (नः) = हमारे लिए (भयोभु) = कल्याण उत्पन्न करनेवाली (भेषजम्) = औषध को (वातु) = प्राप्त कराए । (तत्) = तब (माता पृथिवी) = सब ओषधियों को जन्म देनेवाली मातृस्थानापन्न यह पृथिवी उस भयोभु भेषज को प्राप्त कराए । (तत्) = तब यह (पिता द्यौः) = सूर्य के उचित सन्ताप के द्वारा ओषधियों का रक्षक यह द्युलोक उस भेषज को प्राप्त कराए । देवों की अनुकूलता को सिद्ध करने पर ही ओषधियाँ भी गुणवती होती हैं । प्रकृति के अधिक समीप रहने के कारण पशु मनुष्य की अपेक्षा अधिक स्वस्थ हैं । २. जब हम भी सूर्यादि देवों की अनुकूलता में जीवन चलाते हैं (तत्) = तब (सोमसुतः) = सोमलता आदि ओषधियों को जन्म देनेवाले (ग्रावाणः) = वृष्टिकारक मेघ हमें 'मयोभु भेषज' प्राप्त कराते हैं । हमारे लिए (मयोभुवः) = कल्याण उत्पन्न करनेवाले होते हैं । ३. हे (धिष्ण्या) = उत्तम बुद्धिवाले (अश्विना) = स्त्री - पुरुषो ! आप (तत्) = उस भेषज को (शृणुतम्) = सुनो और उसके समुचित प्रयोग से अपने शरीर को नीरोग बनाकर सुन्दर जीवन बितानेवाले होओ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = प्राकृतिक शक्तियों के सम्पर्क में उनकी अनुकूलता को सिद्ध करने पर ओषिधयाँ भी गुणकारिणी होती हैं । हम उन ओषधियों को जानकर उनके प्रयोग से नीरोगता सिद्ध करें और सुखमय शान्त जीवन बितानेवाले हों ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तौ किं कुर्यातामित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे धिष्ण्यावश्विनावध्येत्रध्यापकौ ! युवं यच्छृणुतं तन्मयोभु भेषजं नो वात इव वैद्यो वातु मातेव पृथिवी तन्मयोभु भेषजं वातु द्यौः पिता तन्मयोभु भेषजं वातु सोमसुतस्तत् ग्रावाणस्तन्मयोभुवो भेषजं वान्तु ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) विज्ञानम् (नः) अस्मभ्यम् (वातः) (मयोभु) परमसुखं भवति यस्मात्तत् (वातु) प्रापयतु (भेषजम्) सर्वदुःखनिवारकमौषधम् (तत्) मान्यम् (माता) मातृवन्मान्यहेतुः (पृथिवी) विस्तीर्णा भूमिः (तत्) पालनम् (पिता) जनक इव पालनहेतुः (द्यौः) प्रकाशमयः सूर्यः (तत्) कर्म (ग्रावाणः) मेघादयः पदार्थाः (सोमसुतः) सोमाः सुता येभ्यस्ते (मयोभुवः) सुखस्य भावयितारः (तत्) क्रियाकौशलम् (अश्विना) शिल्पविद्याध्येत्रध्यापकौ (शृणुतम्) यथावत् श्रवणं कुरुतम् (धिष्ण्या) शिल्पविद्योपदेष्टारौ (युवम्) युवाम् ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - शिल्पविद्यावर्द्धितारावध्येत्रध्यापकौ यावदधीत्य विजानीयातां तावत् सर्वे सर्वेषां मनुष्याणां सुखाय निष्कपटतया नित्यं प्रकाशयेताम्। यतो वयमीश्वरसृष्टिस्थानां वाय्वादीनां पदार्थानां सकाशादनेकानुपकारान् गृहीत्वा सुखिनः स्याम ॥ ४ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the wind, refreshing and delightful, blow good and bring us that healthful medicinal freshness and joy. May mother earth and father sun give us that fresh lease of life. May the clouds, showers of joy, and the soma press of yajna rain down peace, health and happiness on us. O Ashvins, both nature’s powers of growth, complementarity and enlightenment, innately vested with universal wisdom, listen to our prayer.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O intelligent students and teachers of the science of arts and industries, hear our application. May the wind and the Vaidya (Physician) waft to us the beneficial and disease destroying medicament. May mother (who is like the earth) and father (who is like the sun) convey it to us. May the clouds which produce through rain Soma and other plants be givers of health and happiness to us.

पदार्थान्वयभाषाः - (भेषजम्) सर्वदुः खनिवारकम् औषधम् = Medicament that destroys all suffering. (ग्रावारण:) मेधादयः पदार्था: = Clouds and other objects. (धिष्ण्यौ) शिल्पविद्योपदेष्टारौ = Preacher or instructors of technology.
भावार्थभाषाः - It is the duty of the students and teachers of the science of arts and industries etc. to tell for the benefit of mankind what all the news that we may enjoy happiness by taking benefit from the air and other objects of the world.
टिप्पणी: ग्रावेति मेघनाम (निघ० १.१० धिषण्योति वाङ् नाम (निघ० १.११ )

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - शिल्पविद्येची उन्नती करणारे व ते शिकणारे आणि शिकविणारे विद्वान आहेत, ते जितके समजू शकतात तितके सर्वांच्या सुखासाठी सदैव प्रकट करावे, ज्यामुळे आम्ही लोक ईश्वराच्या सृष्टीतील वायू इत्यादी अनेक पदार्थांपासून अनेक उपकार घेऊन सुखी होऊ ॥ ४ ॥