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अ॒स्येदु॑ मा॒तुः सव॑नेषु स॒द्यो म॒हः पि॒तुं प॑पि॒वाञ्चार्वन्ना॑। मु॒षा॒यद्विष्णुः॑ पच॒तं सही॑या॒न्विध्य॑द्वरा॒हं ति॒रो अद्रि॒मस्ता॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asyed u mātuḥ savaneṣu sadyo mahaḥ pitum papivāñ cārv annā | muṣāyad viṣṇuḥ pacataṁ sahīyān vidhyad varāhaṁ tiro adrim astā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य। इत्। ऊँ॒ इति॑। मा॒तुः। सव॑नेषु। स॒द्यः। म॒हः। पि॒तुम्। प॒पि॒वान्। चारु॑। अन्ना॑। मु॒षा॒यत्। विष्णुः॑। प॒च॒तम्। सही॑यान्। विध्य॑त्। व॒रा॒हम्। ति॒रः। अद्रि॑म्। अस्ता॑ ॥

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ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:61» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:11» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (अस्य) इस (मातुः) शत्रु और अपने बल का परिमाण करनेवाले सभाध्यक्ष के (सवनेषु) ऐश्वर्यों में (महः) बड़े (पचतम्) परिपक्व (चारु) सुन्दर (पितुम्) संस्कार किये हुए अन्न को (पपिवान्) खाने-पीने तथा (सहीयान्) अतिशय करके सहन करनेवाला वीर मनुष्य (अन्ना) अन्नों को (अस्ता) प्रक्षेपण करने (मुषायत्) अपने को चोर की इच्छा करते हुए के तुल्य (विष्णुः) सब विद्याओं के अङ्गों में व्यापक (अद्रिम्) पर्वताकार (वराहम्) मेघ को (तिरः) नीचे (विध्यत्) गिराते हुए सूर्य के समान शत्रुओं को (सद्यः) शीघ्र नष्ट करे (इदु) वही मनुष्य सेनाध्यक्ष होने के योग्य होता है ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्न-जल के रसों को चोर के समान हरता वा रक्षा करता हुआ, अपने किरणों से मेघ को हनन कर प्रकट करता हुआ, छिन्न-भिन्न कर अपने विजय को प्राप्त होता है, वैसे ही सेना आदि के अध्यक्ष के सेना आदि ऐश्वर्यों में स्थित हुए शूरवीर पुरुष शत्रुओं का पराजय करें ॥ ७ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

[वज्र से] वराह का वेधन

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अस्य मातः इत्) = गतमन्त्र के अनुसार इस वज्र का निर्माण करनेवाले प्रभु के ही (सवनेषु) = उत्पादन के निमित्त - प्रभु के प्रकाश को अपने हृदय में देखने के उद्देश्य से (सद्यः) = शीघ्र ही (महः पितुम्) = [महस् Power] तेजस्विता के रक्षक सोम को (पपिवान्) = अपने अन्दर ही पीने का प्रयत्न करता है । इस शरीर में ही सुरक्षित किया हुआ यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और यह दीप्त ज्ञानाग्नि हमें प्रभु - दर्शन के योग्य बनाती है । २. (विष्णुः) = व्यापक उन्नति करनेवाला जीव 'शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक' उन्नति करता हुआ और इस प्रकार तीन पग रखता हुआ यह 'त्रिविक्रम' जीव (चारु अन्ना) = सुन्दर सात्विक अन्नों से (पचतम्) = परिपक्व वीर्यरूप धन का (मुषायत्) = अपहरण करता हुआ (सहीयान्) = काम - क्रोधादि शत्रुओं का अतिशयेन पराभूत करनेवाला होता है । प्रभु ने अन्नों में वीर्य को छिपाकर रखा है । इन अन्नों से आँतें रस को लेती हैं, उस रस के परिपाक से रुधिर, उसके परिपाक से मांस, इसी प्रकार उस - उस धातु का परिपाक होते हुए मेदस्, अस्थि, मज्जा व अन्त में वीर्य बनता है । यह वीर्य पूर्ण परिपक्व धातु है । इसे यहाँ 'पचतं' परिपक्व धन कहा गया है । व्यापक उन्नति का इच्छुक जीव इसे सुन्दर अन्नों में से मानो चुराने का प्रयत्न करता है और वीर्यवान् बनकर शत्रुओं का पराभव करनेवाला होता है । ३. यह (वराह विध्यत्) = वराह का वेधन करता है । निघण्टु [१/१०] में वराह का अर्थ मेष किया है । मेघ सूर्य को आवृत करके प्रकाश को विलुप्त करता है, इसी प्रकार अध्यात्म में वासना ज्ञान को आवृत करती है और इसी कारण उसका नाम 'वृत्र' पड़ गया है । मेघ के नामों में भी यह वृत्र शब्द आया है, एवं वराह व वृत्र पर्याय हैं । विष्णु बनने के लिए इस वृत्र व वराह का वेधन आवश्यक है । ४. वृत्र व वराह का वेधन करके यह विष्णु (अद्रिम्) = अविद्या के पर्वत को (तिरः अस्ता) = [तिरस् Across, beyond, over] सुदूर, सात समुद्र पार के प्रदेश में फेंकनेवाला होता है, अर्थात् अपनी अविद्या को दूर करनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के प्रकाश के निमित्त सोम का पान आवश्यक है । सात्त्विक अन्नों के सेवन से हमें सोम का उत्पादन करना है । इस सोम को अपने में सुरक्षित करके हम ज्ञान की आवरणभूत वासना को निरुद्ध करके नष्ट करें और अविद्या - पर्वत को उखाड़ फेंके ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

योऽस्य मातुः सभाद्यध्यक्षस्य सवनेषु महः पचतं चारु पितुं च पपिवान् सहीयान् वीरोऽन्नास्ता मुषायदिव विष्णुः सूर्योऽद्रिं वराहं तिरो विध्यदिव शत्रून् सद्यो हन्यात् स इदु सेनाध्यक्षो योग्यो भवति ॥ ७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) सभाध्यक्षस्य (इत्) अपि (उ) वितर्के (मातुः) परिमाणकर्त्तुः (सवनेषु) ऐश्वर्येषु (सद्यः) समानेऽहनि (महः) महत् (पितुम्) सुसंस्कृतमन्नम् (पपिवान्) रसान् पीतवान् (चारु) सुन्दरम् (अन्ना) अन्नानि (मुषायत्) आत्मनः स्तेयमिच्छत्। अत्र घञर्थे कविधानम् (अष्टा०वा०३.३.५८) इति कः प्रत्ययः, ततः सुप आत्मनः क्यच्। (अष्टा०३.१.८) इति क्यच्, न छन्दस्यपुत्रस्य। (अष्टा०७.४.३५) इतीत्वनिषेधः। (विष्णुः) सर्वविद्याङ्गव्यापनशीलः (पचतम्) परिपक्वम् (वराहम्) मेघम् (सहीयान्) अतिशयेन सोढा (विध्यत्) विध्यति मेघम् (तिरः) अधोगमने (अद्रिम्) पर्वताकारम् (अस्ता) प्रक्षेप्ता ॥ ७ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्योऽन्नजलरसान् चोरयन् गोपायन् स्वकिरणैर्मेघं संहत्य प्रकटयन् छित्वा निपात्य विजयते, तथैव सेनाद्यध्यक्षस्य सेनाद्यैश्वर्येषु स्थिताः शूरवीराः पुरुषाः शत्रून् विजयेरन् ॥ ७ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In the yajnic programmes of this Indra, lord of rule and power who measures everything to size, Vishnu, the great sun pervading everything with its light, drinks up the delicious holy foods prepared and sent up sanctified from the yajna, and then, challenging the mountainous cloud hoarding up the wealth of the same yajnic foods in the form of vapours, breaks up the cloud and throws it down (releasing the showers of rain).

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is he (Indra) is taught further in the 7th Mantra.

अन्वय:

He alone deserves to be the commander of an army who appoints deserving persons on all posts and pervading in or being well-versed in all sciences and possessing wealth, quickly quaffs the soma and well-cooked good food, who destroys his enemies as the sun pierces the vast cloud mountain-like with his rays, making it to fall down, being endowed with the power of endurance and hurling the thunderbolt or powerful weapons.

पदार्थान्वयभाषाः - [मातु:] परिमाणकर्तुः = Measurer or appointer of suitable persons on posts under him. [विष्णु:] सर्वविद्याङ्गव्यापनशील: = Pervading in or well-versed in all sciences.
भावार्थभाषाः - As the sun gets victory over the cloud destroying it with his rays and preserving food materials, water and sap etc. in the same manner, brave persons under the commander of an army should be victorious over their foes.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा सूर्य अन्न व जलाच्या रसांना चोराप्रमाणे हरण करून आपल्या किरणांनी मेघांचे हनन करतो व विदीर्ण करून विजय मिळवितो. तसेच सेनाध्यक्षाच्या सेना इत्यादी ऐश्वर्यात स्थित असलेल्या शूरवीर पुरुषांनी शत्रूंचा पराजय करावा. ॥ ७ ॥